बोध कथा : कालदेव और समय का वरदान
प्राचीन काल की बात है। हिमालय की तराई में एक छोटा-सा नगर था, जहाँ सत्यपाल नाम का एक साधारण किंतु परिश्रमी व्यक्ति रहता था। वह अत्यंत धर्मपरायण था, पर उसके मन में एक दुर्बलता थी। वह दूसरों की उन्नति देखकर भीतर-ही-भीतर ईर्ष्या से भर उठता था। यद्यपि वह किसी का प्रत्यक्ष अहित नहीं करता था, पर उसके विचार सदैव नकारात्मक रहते थे। एक दिन सत्यपाल वन मार्ग से गुजर रहा था। मार्ग में उसने एक वृद्ध ब्राह्मण को प्यास से व्याकुल देखा।
बिना कुछ पूछे उसने अपने कमंडल से जल निकालकर उसे पिला दिया। जल पीते ही उस वृद्ध का स्वरूप दिव्य हो गया। वे स्वयं कालदेव थे- समय और कर्म के अधिष्ठाता देव। कालदेव बोले, “वत्स, तुम्हारे इस निः स्वार्थ कर्म से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें एक अद्भुत वरदान देता हूं। तुम्हें एक घंटे का ऐसा समय दिया जाता है, जिसमें तुम जो भी काम करोगे, उसका फल तुरंत मिलेगा। पर ध्यान रहे- यह समय फिर कभी लौटकर नहीं आएगा।”
यह कहकर कालदेव अंतर्धान हो गए। सत्यपाल का मन उत्साह से भर उठा। उसने सोचा- अब तो मैं अपने भाग्य को बदल दूंगा। वह नगर लौटा और सबसे पहले अपने धनी पड़ोसी के घर गया। मन में आया कि यदि उसका धन नष्ट हो जाए, तो मेरा सम्मान बढ़ेगा। जैसे ही उसने यह विचार किया, पड़ोसी का धन हानि में बदल गया। यह देखकर सत्यपाल के मन में अजीब-सी तृप्ति हुई। फिर वह अपने प्रतिद्वंद्वी के पास गया और उसके पतन की कामना की। वह भी पूरी हो गई। एक के बाद एक, वह दूसरों के अहित की योजनाएं बनाता रहा और समय बीतता गया। उसे लगा जैसे शक्ति उसके हाथ में है और वही सब कुछ है।
अचानक सूर्य अस्त होने लगा। सत्यपाल चौंका। उसे याद आया कि उसने अपने लिए कुछ भी नहीं मांगा। वह दौड़ता हुआ अपने घर पहुंचा और मन ही मन दीर्घायु, सुख और शांति की कामना करने लगा। तभी आकाश में कालदेव की वाणी गूंजी- “वत्स, समय समाप्त हो चुका है। तुमने जो शक्ति पाई थी, उसका उपयोग दूसरों को गिराने में किया, जो मनुष्य समय को द्वेष में गंवाता है, समय उसे ही लील लेता है।”
क्षणभर में सत्यपाल का शरीर दुर्बल हो गया। उसे अपनी भूल का बोध हुआ, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। यह कथा सिखाती है कि ईश्वर द्वारा दिया गया समय और सामर्थ्य अमूल्य होता है, जो उसका उपयोग दूसरों के कल्याण में करता है, वही वास्तव में धन्य होता है। द्वेष और ईर्ष्या में किया गया प्रत्येक कर्म अंततः स्वयं के पतन का कारण बनता है।
