अनोखी परंपरा: तोप की गूंज से मिलता है, सहरी का पैगाम
राजस्थान के अजमेर शहर में पवित्र रमजान माह के दौरान एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवित है। आधुनिक तकनीक और मोबाइल अलार्म के इस दौर में भी यहां सदियों पुरानी एक परंपरा लोगों को सहरी के लिए जगाने का काम करती है। जैसे ही रात गहराती है और शहर शांत नींद में डूब जाता है, तभी बड़ी पीर पहाड़ी की ओर से एक तेज और गूंजदार धमाके की आवाज सुनाई देती है। यह कोई सामान्य आवाज नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक तोप का धमाका होता है, जो रोजेदारों को सहरी के समय का संकेत देता है।
तोप की यह आवाज सुनते ही शहर के कई इलाकों में लोग जाग जाते हैं और सहरी की तैयारी में लग जाते हैं। यह परंपरा अजमेर की विश्व प्रसिद्ध अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़ी हुई है। दरगाह परिसर के समीप स्थित बड़ी पीर पहाड़ी से रमजान के पूरे महीने हर रोज तोप दागी जाती है। इसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है और यह आवाज रोजेदारों के लिए अलार्म का काम करती है।
इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को निभाने वाली शख्सियत हैं फौजिया खान, जिन्हें अजमेर में लोग स्नेहपूर्वक “तोपची” के नाम से जानते हैं। इस परंपरा की खास बात यह है कि इसे निभाने का जिम्मा एक महिला के हाथों में है, जो इसे और भी विशिष्ट बना देता है। फौजिया खान बताती हैं कि रमजान के दौरान मुसलमान सूर्योदय से पहले सहरी करते हैं और उसके बाद दिनभर रोजा रखते हैं, जो सूर्यास्त के समय इफ्तार के साथ खोला जाता है। सहरी का समय सीमित होता है, इसलिए लोगों को समय पर जगाने के लिए यह परंपरा शुरू की गई थी।
इतिहासकारों के अनुसार, तोप चलाने की यह परंपरा मुगल काल से चली आ रही है। उस समय घड़ियों और आधुनिक साधनों का अभाव था, इसलिए लोगों को समय का संकेत देने के लिए इस तरह के तरीके अपनाए जाते थे। अजमेर में यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि अजमेर शरीफ दरगाह में होने वाली कई महत्वपूर्ण रस्मों की शुरुआत भी इसी तोप के धमाके से होती है।
गरीब नवाज के उर्स के आगाज का संकेत भी इसी तोप की आवाज से दिया जाता है। प्रशासन और पुलिस की निगरानी में यह परंपरा हर वर्ष सुरक्षित रूप से निभाई जाती है। रमजान के दौरान अजमेर की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और इतिहास की जीवंत झलक भी प्रस्तुत करती है।
