ओटीटी सूबेदार 2026
सेना का एक सूबेदार (अनिल कपूर) जो सेना में देश रक्षा के कर्तव्यवश अपने परिवार की अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पाता है और यह अपराध बोध उसके मन पर छाया रहता है, जिसे वह किसी से भी बांट नहीं पाता, जब अपने गांव लौटता है, तो व्यवस्था के प्रति उसका क्रोध किस तरह फूटता है यह कहानी है सूबेदार की।
सूबेदार का अपराधबोध जन्य क्रोध उसे अपनी बेटी (राधिका मदान) से भी खुलने नहीं देता, जो दोनों के बीच एक अविश्वास को पैदा कर देता है। यह एक सब प्लॉट है सूबेदार का। एक दोस्त है सूबेदार का (सौरभ शुक्ला) जो हर हाल में साथ है, जो एक से हालात में रहने से पैदा हुई सहानुभूति को दर्शाता है और दूसरी तरफ व्यवस्था में भ्रष्टाचार (कोऑपरेटिव बैंक का माहौल) और गुंडागर्दी ( मोना सिंह, आदित्य रावल और फैसल मलिक) है, जिससे सूबेदार को निपटना है। कुल मिलाकर सारे के सारे चरित्र अधकचरे हैं सिवाय सूबेदार के और वह भी फिल्म में खुद को जस्टिफाई करने में असफल है।
लगता है कि निर्देशक और लेखक का एक मात्र उद्देश्य अनिल कपूर को एक्शन हीरो दिखाकर ओटीटी की दुनिया में जमाना और शायद वह उसमें सफल हुए हैं और इस चक्कर में सौरभ शुक्ला और मोना सिंह जैसे दो बहुत अच्छे एक्टर्स कुर्बान हो गए। दोनों को कुछ डायलॉग्स और सींस मिले हैं, पर दोनों करीब-करीब बेअसर। मोना सिंह कई बार सुरेखा सीकरी की याद दिलाती है, मुझे लगता है वह धीरे-धीरे लुक्स और डायलॉग डिलीवरी में उसके जैसी होती जा रही है, इसे प्रशंसा समझें पर सूबेदार में तो व्यर्थ हो गई हैं।
राधिका मदान ने अच्छा रोल किया है, परंतु कमजोर लेखन और निर्देशन की गलतियों के कारण उसका चरित्र स्थापित ही नहीं हो पाता। खुशबू और नाना को दिखाने की आवश्यकता ही क्या थी? बाकी लोगों ने बेकार में खूब फुटेज खाया है। निर्देशक बहुत समय तक फिल्म में अपने उद्देश्य को ही नहीं बता पाता। कुछ भी क्यों हो रहा है बस आप सोचते रहिए, बल्कि अंत तक कहानी के टुकड़े जोड़ना ही कठिन है। अंत ने तो उद्देश्य रहित लेखन की पोल ही खोल दी है।
सिर्फ अनिल कपूर हैं फिल्म में। ओढ़िये या बिछाइए। पार्श्व संगीत कहीं-कही प्रभावित करता है पर लाउड है। संवाद एकदम बेकार हैं। दृश्यंकन में कल्पना का अभाव है , आसमान में ऊंचे हवाई जहाज की परछाईं जमीन पर आपने देखी है? अगर अनिल और राधिका से आपका मन भरे, एक्शन आपको भाता हो, तो देखिए सूबेदार, कहानी तो बेदम है। सोचिए, क्या हमें फिल्मों में कबीर सिंह, एनिमल, गर्लफ्रेंड के नायकों के अतिचारी चरित्रों से बचना इतना कठिन होता जा रहा है कि कहानी के और कोमल अंगों पर ध्यान ही न दिया जा सके? क्या-क्या और बर्बाद कर के दम लेंगे हम? समीक्षक -ब्रज राज नारायण सक्सेना
