संपादकीय: जांच तो एक बहाना है
ट्रंप ने भारत समेत 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ अपने उस व्यापार कानून की धारा 301 के तहत नई व्यापारिक जांच शुरू करने की घोषणा की है, जिसके माध्यम से अमेरिका किसी भी देश की व्यापारिक नीतियों को ‘अनुचित’ ठहराते हुए एकतरफा टैरिफ बढ़ा सकता है।
यह जांच अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए मनमाने पुराने टैरिफ को रद्द करने के बाद उसको दूसरे तरीकों से लागू करने तथा अमेरिकी संरक्षणवाद की वापसी का बहाना है। धारा 301 के तहत अमेरिका सैद्धांतिक रूप से काफी ऊंचे टैरिफ लगा सकता है, वैश्विक प्रतिक्रिया और प्रतिशोधात्मक टैरिफ के बढ़ते जोखिम को नजरअंदाज कर वह 25 से 100 प्रतिशत तक टैरिफ थोप सकता है।
अमेरिका ने कनाडा को इस सूची में शामिल नहीं किया है। इसका प्रमुख कारण उत्तरी अमेरिकी व्यापार ढांचे और आपूर्ति श्रृंखला में दोनों देशों की गहरी परस्पर निर्भरता है। इससे यह साफ है कि यह जांच पूरी तरह आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक भी है, दरअसल ट्रंप प्रशासन की व्यापक रणनीति अमेरिकी उद्योगों को पुनर्जीवित करने और उत्पादन को वापस अमेरिका लाने की है। ‘री-शोरिंग’ या ‘फ्रेंड-शोरिंग’ की यह नीति अमेरिकी श्रमिकों के लिए नौकरियां पैदा करने के उद्देश्य से प्रस्तुत की जाती है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिल आपूर्ति श्रृंखलाओं के दौर में केवल टैरिफ के सहारे उद्योगों को वापस लाना आसान नहीं है।
ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक शीघ्र प्रस्तावित है, संभव है कि यह कदम चीन के साथ होने वाली वार्ताओं में दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो। अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत लगभग 60 देशों की औद्योगिक नीतियां अमेरिकी उद्योग और व्यापार को नुकसान पहुंचा रही हैं। विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र में ‘अतिरिक्त उत्पादन क्षमता’ और ‘डंपिंग’ को लेकर चिंता जताई गई है। सच यह है कि आज के वैश्विक बाजार में उत्पादन क्षमता बढ़ाना किसी भी देश की औद्योगिक रणनीति का स्वाभाविक हिस्सा है।
भारत की उत्पादन नीतियां जैसे विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाएं मुख्यतः घरेलू विकास और निर्यात क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई हैं, न कि किसी देश के व्यापार को प्रभावित करने के लिए। भारत पर जबरन श्रम या बड़े पैमाने पर डंपिंग के आरोप निराधार हैं। भारत का निर्यात ढांचा अभी भी चीन की तुलना में काफी संतुलित है और कई क्षेत्रों में वह वैश्विक बाजार की वास्तविक मांग पर आधारित है। फिर भी इस जांच का असर भारत के कुछ प्रमुख निर्यात क्षेत्रों जैसे- स्टील, ऑटो पार्ट्स, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल और आईटी हार्डवेयर पर पड़ सकता है।
भारत इस जांच में औपचारिक रूप से असहयोग का रास्ता नहीं अपना सकता, क्योंकि इससे अमेरिका को एकतरफा कार्रवाई का बहाना मिल जाएगा। बेहतर रणनीति यह होगी कि भारत तथ्यात्मक जवाब और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट करे। भारत सरकार को चाहिए कि वह निर्यात बाजारों का विविधीकरण और घरेलू विनिर्माण की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ा कर समस्या का दीर्घकालिक समाधान खोजे। वैश्विक व्यापार की इस नई खींचतान में संतुलित और व्यावहारिक नीति ही भारत के हितों को सुरक्षित रख सकती है।
