संपादकीय: तेल संकट की धार
अमेरिका द्वारा भारत को रूसी तेल की खरीद के लिए 30 दिन की छूट के पीछे हमारे प्रति सदाशयता का प्रदर्शन अथवा कोई दयानतदारी नहीं है। अमेरिका चाहता है कि तेल लेकर समुद्र में खड़े रूसी टैंकर उसके प्रतिद्वंद्वी चीन की तरफ रुख करें, इससे पहले यह तेल भारत की रिफाइनरियों में पहुंच जाए और फिर शोधित होकर उन देशों के पास जाएं, जो तेल के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं। बेशक तेल संकट से परेशान देश कहीं न कहीं इस आफत के लिए अमेरिका को भी जिम्मेदार मानेंगे और इससे उसकी साख गिरेगी। सो अमेरिका ने अपने हित में यह फैसला लिया है।
यह बात उसकी इस चेतावनी से ही साफ है कि यह अल्पकालिक और व्यावहारिक प्रयास है, इसे रूसी तेल खरीद के बारे में अमेरिकी नीति के बारे में किसी बदलाव का संकेत न समझा जाए। असल में पश्चिमी एशिया में छिड़े संघर्ष के चलते उन देशों को जो तेल के बड़े उत्पादक है, उन्हें छोड़ कर संसार के तकरीबन सारे ऐसे देशों पर जो ईंधन या ऊर्जा का बेतरह इस्तेमाल करते हैं और इसके लिए वे आयात पर निर्भर हैं, तेल संकट गहराता जा रहा है।
पाकिस्तान में तेल के दाम 55 रुपये फी लीटर बढ़ना, 50 फीसदी कर्मचारियों को घर से काम के आदेश और सरकार के मंत्रियों, सलाहकारों को एक महीने बिन वेतन भत्ते के रहने की सलाह तथा बांग्लादेश में कई बड़े संस्थानों में सप्ताह भर की बंदी और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें, इसके नजदीकी गवाह हैं। सरकार ने कच्चे तेल के दाम 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने से पहले पेट्रोल, डीजल का दाम न बढ़ाने का फैसला लिया है, पर दाम अभी 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है, जल्द ही इसके 130 डॉलर प्रति बैरल भी पहुंचने की पूरी आशंका है, फिर घरेलू गैस और सीनजी के दाम भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में आसमान छू ही रहे हैं, तिसपर आपूर्ति भी बाधित है। देश के कई राज्यों में कामर्शियल सिलिंडर दुर्लभ है, तो साथ ही देश भर में घरेलू सिलिंडर की बुकिंग अवधि चार दिन बढ़ा दी गई है। यह सब इस बात का साफ संकेत है कि तेल का विकट संकट हमारे निकट भी आता जा रहा है, वायदा कारोबार में कच्चे तेल की कीमतों में 26 प्रतिशत से अधिक का उछाल और भारतीय शेयर बाजार में कोहराम भी यही कह रहा है।
यह जंग लंबी चली तो हमारा रिजर्व आखिर कब तक चलेगा? संकट बढ़ा तो हमें हर महीने सात से आठ अरब डॉलर का घटा झेलना पड़ेगा। फलस्वरूप मुद्रास्फीति, महंगाई बढ़ेगी, विदेशी मुद्रा का नुकसान होगा, राजस्व घाटा तथा चालू खाते का घाटा भी बढ़ेगा। भारत ने अपने आपूर्ति आधार को 27 से बढ़ाकर 40 देशों तक फैलाना, होर्मुज के अलाव अन्य रास्ते से तेल मंगाने की व्यवस्था किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष के प्रभाव को कम करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा घेरा प्रदान करता है। पर आसन्न संकट को देखते हुए संकट गहराने से पहले सरकार को चाहिए कि वह आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए गैर जरूरी खपत को नियंत्रित करने एवं खरीद और भंडारण के नए तरीके तलाशे।
