संपादकीय: सामाजिक सहमति जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे निरस्त करने के अनुरोध वाली याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी वास्तव में अत्यधिक समीचीन है कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए अब एक समान कानून की जरूरत विधायिका यानी सरकार को महसूस होनी ही चाहिए।
देश में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। यही विविधता समय-समय पर न्यायिक और सामाजिक विवादों का कारण बनती रही है। साफ सी बात है कि पर्सनल लॉ में लैंगिक असमानता बनी रहती है, तो उसका स्थायी समाधान समान नागरिक संहिता ही हो सकती है।
जब समान नागरिक संहिता का विचार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित है और जो राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश देता है कि पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू हों, तब इसे बनाने और लागू करने में क्या हर्ज है, गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में लागू हो चुके कानून को देशव्यापी बनाने में क्या कोई राजनीतिक रोड़ा है? यूसीसी से कानून के समक्ष समानता और लैंगिक न्याय को मजबूती मिलेगी। अलग-अलग धार्मिक कानूनों के कारण विवाह, तलाक और संपत्ति अधिकारों में महिलाओं के साथ असमान व्यवहार की शिकायतें दूर हो जाएंगी।
एक समान नागरिक कानून विभिन्न धर्मों के बीच कई असमानताओं को समाप्त कर नागरिकता की समान अवधारणा को मजबूत कर सकता है। इसके अतिरिक्त इससे राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था को भी बल मिलेगा, हालांकि इस कानून के निर्माण में इसका ध्यान रखना पड़ेगा कि देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता अत्यंत व्यापक है और अनेक समुदाय अपने व्यक्तिगत कानूनों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं।
ऐसे में एक समान कानून लागू करने को कुछ लोग धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देख सकते हैं। यदि विधायिका ने इसे ध्यान में रखे बिना कानून बनाया और लागू करने की प्रक्रिया में सामाजिक संवाद और सहमति को शामिल नहीं किया तो इससे सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है। आखिर संविधान निर्माताओं ने यूसीसी को मौलिक अधिकारों के बजाय नीति निर्देशक तत्वों में इसीलिए रखा था, ताकि इसे समय और सामाजिक परिपक्वता के अनुसार लागू किया जा सके।
आजादी के बाद से इस विषय पर अनेक आयोग, बहसें और न्यायिक टिप्पणियां हुईं, किंतु अभी तक दो राज्यों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू नहीं किया जा सका है। कई नजरिये से यह स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता केवल कानूनी सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति का भी विषय है। यदि इसका उद्देश्य वास्तव में लैंगिक न्याय, समानता और आधुनिक नागरिकता की भावना को मजबूत करना है, तो इसे जल्दबाजी के बजाय व्यापक संवाद, संवेदनशीलता और चरणबद्ध सुधारों के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
