नवरात्रि आत्मिक शुद्धि का पर्व
अध्यात्म पथ पर प्रगतिशील साधकों के लिए नवरात्रि के त्योहार की अनुपम महिमा है। शिवरात्रि साधक के लिए साधना में प्रवेश करने का काल है, तो नवरात्रि उत्सवपूर्ण नवीनीकरण के अवसर की नौ रात्रियां हैं। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्रि अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्रि का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। अपने भीतर की ऊर्जा जगाना ही देवी उपासना का मुख्य प्रयोजन है।
दुर्गा पूजा और नवरात्रि मानसिक-शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक हैं। ज्योतिष शास्त्र में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है, क्योंकि चैत्र नवरात्र के बाद सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राशियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फिर से अगला चक्र पूरा करने के लिए पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राशि मेष दोनों ही अग्नि तत्व वाले हैं इसलिए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है। चैत्र नवरात्रि से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है।- पं. मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य, आध्यात्मिक लेखक
हिंदू नववर्ष शुरुआत
चैत्र नवरात्रि का धार्मिक दृष्टि से खास महत्व है, क्योंकि चैत्र नवरात्रि के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थी और देवी के कहने पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण का कार्य शुरु किया था। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिंदू नववर्ष शुरु होता है। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल आश्विन और चैत्र मास में जिन दिनों आता है, वे नवरात्रि कहलाते हैं। उन दिनों शरीर, मन और प्रकृति के विभिन्न घटकों में विशेष रूप से उल्लास भरा रहता है। वातावरण में विशिष्टता व्याप्त रहती है। शरीर दबे हुए रोगों को निकालने का प्रयास करता है। इसीलिए इन दिनों रोग बढ़ जाते हैं। आयुर्वेद इस अवसर को शरीर शोधन के लिए विशेष उपयोगी मानता है। चैत्र नवरात्रि में वसंत होता है। प्रकृति की शोभा देखते ही बनती है। वनस्पतियां नवीन पल्लव धारण करती हैं। प्रकृति का उल्लास अपना प्रभाव समूचे वातावरण पर डालता है। जीवधारियों के मन विशेष प्रकार की मादकता से भर जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से मनीषियों ने इन दिनों आत्मा के ऋ तुमति होने का आलंकारिक संकेत किया है। उनके अनुसार, इन दिनों वह अपने प्रियतम परमात्मा से मिलने के लिए विशेष रूप से आतुर होती है। नौ दिन का व्रत-उपवास प्राकृतिक उपचार के समतुल्य माना जा सकता है। इसमें प्रायश्चित के निष्कासन और पवित्रता की अवधारणा दोनों भाव हैं। चैत्र की नवरात्रि के साथ रामजन्म एवं रामराज्य की स्थापना का इतिहास है। इस कारण इस नवरात्रि का महत्व सर्वाधिक है।
व्रत का सकारात्मक प्रभाव
नवरात्रि के समय प्रकृति में एक विशिष्ट ऊर्जा होती है, जिसको आत्मसात कर लेने पर व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है। व्रत में हम कई चीजों से परहेज करते हैं और कई वस्तुओं को अपनाते हैं। आयुर्वेद की धारणा है कि पाचन क्रिया की खराबी से ही शारीरिक रोग होते हैं, क्योंकि हमारे खाने के साथ जहरीले तत्व भी हमारे शरीर में जाते हैं। आयुर्वेद में माना गया है कि व्रत से पाचन प्रणाली ठीक होती है। व्रत उपवास का प्रयोजन भी यह है कि हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने मन-मस्तिष्क को केंद्रित कर सकें।
मनोविज्ञान यह भी कहता है कि कोई भी व्यक्ति व्रत-उपवास एक शुद्ध भावना के साथ रखता है। उस समय हमारी सोच सकारात्मक रहती है, जिसका प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है, जिससे हम अपने भीतर नई ऊर्जा महसूस करते हैं। इस समय प्रकृति अपना स्वरूप बदलती है।
वातावरण में एक अलग-सी आभा देखने को मिलती है। पतझड़ के बाद नवीन जीवन की शुरुआत, नई पत्तियों और हरियाली की शुरुआत होती है। संपूर्ण सृष्टि में एक नई ऊर्जा होती है। इस ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करने के लिए हमें व्रतों का संयम-नियम बहुत लाभ पहुंचाता है। नवरात्रि में कृषि-संस्कृति को भी सम्मान दिया गया है। मान्यता है कि सृष्टि की शुरुआत में पहली फसल जौ ही थी। इसलिए इसे हम प्रकृति (मां शक्ति) को समर्पित करते हैं।
नवरात्रि पूजन कैसे करें –
नवरात्रि के पहले दिन घर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वास्तिक बनाएं और दरवाजे पर आम के पत्ते का तोरण लगाएं। क्योंकि माता इस दिन भक्तों के घर में आती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं और आपके घर में निवास करती हैं।
नवरात्रि में माता की मूर्ति को लकड़ी की चौकी या आसन पर स्थापित करना चाहिए। जहां मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें वहां पहले स्वास्तिक का चिह्न बनाएं। उसके बाद रोली और अक्षत से टीकें और फिर वहां माता की मूर्ति को स्थापित करें। उसके बाद विधि-विधान से माता की पूजा करें।
वास्तुशास्त्र के अनुसार, उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को पूजा के लिए सर्वोत्तम स्थान माना गया है। आप भी अगर हर साल कलश स्थापना करते हैं, तो आपकी इसी दिशा में कलश रखना चाहिए और माता की चौकी सजानी चाहिए।
नवरात्रि के दिनों में कण-कण में मां दुर्गा का वास माना जाता है और पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है। वास्तु में बताया गया है कि एक चावल से भरा पीतल का कलश अपने मंदिर के उत्तर-पूर्व में रखना समृद्धिदायक होता है। ऐसा करने से मां आपके धन-धान्य में वृद्धि करती हैं और आपके घर में समृद्धि आती है।
ध्यान रहे कि पूजन कक्ष साफ़-सुथरा हो और उसकी दीवारें हल्के पीले, गुलाबी जैसे आध्यात्मिक रंग की हो तो अच्छा है, क्योंकि ये रंग आध्यात्मिक ऊर्जा के स्तर को बढ़ाते हैं। इसके साथ ही काले, नीले और भूरे जैसे तामसिक रंगों का प्रयोग पूजा कक्ष की दीवारों पर नहीं होना चाहिए।
धर्म शास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। वास्तु के अनुसार ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व जल एवं ईश्वर का स्थान माना गया है और यहां सर्वाधिक सकारात्मक ऊर्जा रहती है। इसलिए पूजा करते समय माता की प्रतिमा या कलश की स्थापना इसी दिशा में करनी चाहिए। देवी पूजा-अनुष्ठान के दौरान मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार लगाने से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करती।
नवरात्रि के नियम
नवरात्रि का व्रत रखने और पूजन करने के कुछ नियम भी होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भक्त इन नियमों के साथ माता रानी की पूजा उपासना करता है, उस पर माता रानी की अति कृपा होती है। मातारानी उसकी सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं |
धार्मिक कार्यों में मन लगाएं
नवरात्रि के 9 दिनों में व्रतधारी को अपना मन भौतिकता की चीजों से दूर रखना चाहिए। उन्हें अपना मन हमेशा माता रानी के चरणों में लगाकर रखना चाहिए। धार्मिक कार्यों में समय बिताना चाहिए। इस दौरान दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तसती का पाठ करते रहना चाहिए।
कन्याओं/महिलाओं का सम्मान करना चाहिए
भारतीय परंपरा में कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। इसी कारण से लोग नवरात्रि में कन्याओं का पूजन कर पुण्य प्राप्त करते हैं। नवरात्रि के दिन में सभी महिलाओं में किसी न किसी देवी का स्वरूप होता है। इसीलिए किसी भी कन्या/ महिला के प्रति असम्मान का भाव नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनमें मां दुर्गा के किसी न किसी स्वरूप को मानकर मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।
घर को न छोड़े अकेला
यदि घर में कलश (घट) की स्थापना हुई हो या माता की चौकी या ज्योति लगी हो, तो किसी न किसी को हमेशा उसके पास रहना चाहिए। इस दौरान घर में किसी एक व्यक्ति का होना जरूरी होता है। व्रतधारी को दिन में नहीं सोना चाहिए।
तामसिक भोजन से करें परहेज
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान व्यक्ति को सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्हें तामसिक प्रवृति के भोजन से परहेज रखना चाहिए। नवरात्रि के 9 दिनों में आहार, व्यवहार और विचार में सात्विकता होनी चाहिए।
कामवासना पर रखें नियंत्रण
नवरात्रि के दिनों में कामवासना से मनसा वाचा कर्मणा विरक्त रहना चाहिए। महिला और पुरुष दोनों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
क्रोध से रहें दूर
नवरात्रि के दौरान व्यक्ति को क्रोध नहीं करना चाहिए, उन्हें अधिक से अधिक समय तक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए।
