Bareilly : वैज्ञानिकों ने कर दिया कमाल...5 दिन में 5 नर बछड़ों की मां बनी ‘नंदिनी’
रतन सिंह गुर्जर, बरेली। दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के साथ किसानों की आय में बढ़ोत्तरी के लिए भारतीय वैज्ञानिक तेजी से काम कर रहे हैं। पशुओं की नस्ल सुधार पर काम कर रहे इंडियन वेटनेरी रिसर्च इंस्टीट्यूट(आईवीआरआई) बरेली की वैज्ञानिक टीम ने साहीवाल नस्ल की गाय के जरिए पांच दिन में पांच बच्चे तैयार करने में सफलता हासिल की है। खास बात ये है कि सबके सब बछड़े हैं और हूबहू रुप-रंग में अपनी मां ‘नंदिनी’ मां पर गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि नई तकनीक से साल में एक पशु से से दर्जनों बच्चे पैदा कराए जा सकते हैं।
आईवीआरआई के वैज्ञानिकों ने उन्नत सहायक प्रजनन तकनीक (ओपीयू-आईवीएफ-ईटी) के माध्यम से स्वदेशी साहीवाल नस्ल के स्वस्थ बछड़ों को पैदा कराया है। इसे देशी मवेशी नस्लों के संरक्षण और उनकी उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। वैज्ञानिक टीम ने अल्ट्रासाउंड आधारित ओवम पिक-अप, इन विट्रो निषेचन और भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीकों का उपयोग करते हुए 28 फरवरी से पांच दिन के अंदर पांच स्वस्थ साहीवाल बछड़ों का जन्म कराया।
ये बछड़े उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली गायों के उत्कृष्ट जर्मप्लाज्म से विकसित किए गए हैं। इसमें निषेचन के लिए प्रमाणित और उच्च क्षमता के बैल वीर्य का उपयोग किया गया, ताकि बेहतर आनुवंशिक गुण सुनिश्चित हो सकें। यह सफलता वर्ष 2022-23 में शुरू किए गए उस विशेष कार्यक्रम का परिणाम है, जिसके तहत साहीवाल, थारपारकर गाय और मुर्रा भैंस जैसी प्रमुख देशी नस्लों की आनुवंशिक क्षमता को बढ़ाने पर कार्य किया जा रहा है।
आईसीएआर पशु विज्ञान के उप महानिदेशक राघवेंद्र भट्टा ने बताया कि यह उपलब्धि भविष्य में पशुधन विकास का व्यावहारिक मॉडल बनेगी। इससे देशी नस्लों के संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इस शोध कार्य डॉ. बृजेश कुमार के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों के सहयोग और शोधार्थियों के समर्थन से संपन्न किया गया। इसके लिए डॉ. एसके सिंह का मार्गदर्शन रहा।
क्या है ओपीयू-आईवीएफ-ईटी तकनीक
इस तकनीक के तहत श्रेष्ठ नस्ल की गायों से अंडाणु निकालकर प्रयोगशाला में निषेचन किया जाता है और विकसित भ्रूण को दूसरी गाय में प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे कम समय में अधिक संख्या में उच्च गुणवत्ता वाले बछड़ों का जन्म संभव हो पाता है।
जानें, कब से शुरू हुआ पशुओं में आईवीएफ प्रयोग
पशुओं में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन(आईवीएफ) यानी टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक का पहला सफल प्रयोग 1959 में हुआ था। चाइनीज-अमेरिकी वैज्ञानिक एम.सी. चांग ने खरगोश के भ्रूण को प्रयोगशाला में विकसित करके पहली बार एक जीवित खरगोश को पैदा कराने में कामयाबी हासिल की थी। इसके बाद कई शोध हुए लेकिन व्यावसायिक उपयोग 1980 के दशक के बाद शुरू हो सका। भारत में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत उच्च गुणवत्ता वाली देशी गायों और भैंसों की नस्ल सुधार के लिए ओपियु-आईवीएफ (OPU-IVF) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इसके जरिए एक गाय से साल में 100 से अधिक बछड़े प्राप्त किए जा सकते हैं।
