कुटनी आइलैंड : शांति और सौंदर्य का अनूठा संगम

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Published By Anjali Singh
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उस दिन हल्की गर्म दोपहर थी। हमारी कार ठीक 1 बजकर 10 मिनट पर एक ऐसी जगह आकर रुकी, जहां पहुंचते ही लगा कि हम किसी पर्यटन स्थल पर नहीं, बल्कि एक अलग ही मनः स्थिति में प्रवेश कर गए हैं। गांव छूटने के बाद जीवन में बहुत-सी चीजें पीछे रह जाती हैं। उनमें से एक होली भी है। शहरों की होली में रंगों की चमक तो होती है, लेकिन वह मन में उसी तरह नहीं उतरती जैसे गांव में फाग के गीतों के साथ खेली जाने वाली होली उतरती थी। शायद उसी खोई हुई अनुभूति की तलाश में अब हर होली पर मैं किसी नई जगह की ओर निकल पड़ता हूं।

मन के पास प्रकति की सुंदरता 

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इस होली पर भी समय और साधन सीमित थे। खजुराहो की यात्रा के दो दिन पूरे हो चुके थे और मेरे पास खुद से चुराया हुआ बस एक दिन और था। उसी दिन मैं अपने साथियों प्रिया और माधव के साथ खड़ा था एक बेहद सुंदर जगह पर कुटनी आइलैंड। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में, विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो से लगभग 12 किलोमीटर दूर, कुटनी जलाशय के बीच स्थित यह छोटा-सा टापू मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा विकसित किया गया है। पानी से घिरे इस शांत द्वीप पर एमपी टूरिज्म के केवल दस कॉटेज बने हुए हैं, जहां ठहरकर पर्यटक इस जगह की प्राकृतिक सुंदरता को करीब से महसूस कर सकते हैं।

जलक्रीड़ा का रोमांच और गहरी शांति

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रिजॉर्ट तक पहुंचने का अनुभव भी अपने आप में अलग है। मुख्य परिसर से लगभग 700 मीटर पहले वाहन पार्क करना पड़ता है। इसके बाद पैदल या ई-कार्ट से एक लोहे के पुल को पार करते हुए इस टापू तक पहुंचना होता है। पुल पार करते ही सामने खुलती है एक शांत दुनिया चारो ओर फैली जलराशि और बीच में मखमली हरियाली से घिरा छोटा-सा टापू। कॉटेज के कमरे का पर्दा हटाते ही दूर तक फैला पानी दिखाई देता है और दरवाजा खोलते ही सामने हरी घास का खुला मैदान। यहां प्रकृति और आधुनिकता का संतुलित मेल दिखाई देता है। एक ओर बोटिंग और जलक्रीड़ा का रोमांच है, तो दूसरी ओर गहरी शांति।

क्षितिज पार उगता लाल सूर्य

कई वर्षों बाद यहां आकर मैंने सूर्यास्त और सूर्योदय दोनों देखे। सूर्योदय देखने की उत्सुकता इतनी थी कि जिस व्यक्ति को सामान्य दिनों में सुबह नौ बजे उठना भी कठिन लगता है, वह उस दिन पांच बजे ही उठ गया। सुबह की ओस से भीगी घास पर नंगे पैर टहलते हुए अचानक मन दार्शनिक हो उठा। चारों ओर जल से घिरे उस टापू पर मेरे साथ एक दुबला-सा आवारा श्वान भी टहल रहा था। तभी मन में एक प्रश्न उठा  आखिर कितने दिनों बाद मेरे पैरों ने मिट्टी को सीधे छुआ है? मिट्टी में जन्मा, धूल भरे गांव की गलियों में खेला और शहर की गर्म सड़कों पर मीलों पैदल चला मनुष्य कब अपने और धरती के बीच इतनी दूरी बना बैठा, शायद इसका एहसास हमें ऐसे ही क्षणों में होता है।

उसी समय क्षितिज के उस पार से उगते हुए लाल सूर्य ने जैसे इस विचार यात्रा को विराम दिया। मन में तुलसीदास की पंक्तियां स्वतः गूंज उठीं  “छिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा।”और मैं उस क्षण को अपने कैमरे में कैद करने लगा। कुटनी आइलैंड उन जगहों में से है, जहां यात्रा केवल पर्यटन नहीं रह जाती। कभी-कभी ऐसी यात्राएं हमें नई जगहें नहीं दिखातीं, बल्कि हमारी खोई हुई अनुभूतियों को वापस लौटा देती हैं। इस यात्रा ने मुझे लौटाकर दी, मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी। - मृदुल कपिल