सृष्टि के स्मार्ट सर्जक  

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Published By Anjali Singh
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प्रकृति की हर रचना के पीछे एक सुस्पष्ट उद्देश्य और जीवन का गहरा विज्ञान छिपा होता है। पक्षियों के लिए घोंसला महज तिनकों का संकलन नहीं, बल्कि उनके वंश की सुरक्षा का एक अभेद्य दुर्ग है। ये नीड़ न केवल उन्हें प्रकृति के थपेड़ों-सर्दी, गर्मी और बरसात से बचाते हैं, बल्कि शत्रुओं से सुरक्षा का एक मनोवैज्ञानिक और भौतिक कवच भी प्रदान करते हैं। वर्षावनों की सघनता हो या ग्रामीण अंचलों की शांति, परिंदों ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ऐसे समाधान खोजे हैं, जो आधुनिक इंजीनियरिंग को भी विस्मय में डाल देते हैं।- डॉ. कैलाश चन्द सैनी, पक्षी साहित्य एवं वन्य जीवों के विशेषज्ञ लेखक, जयपुर

ब्लू मैनाकिन: लहराती पूंछ और दृश्य-भ्रम का विज्ञान

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ब्राजील के दक्षिण-पूर्वी जंगलों में जब हवा का झोंका आता है, तो पेड़ों की डालियों से काई और घास की लंबी-लंबी लटें झूलती दिखाई देती हैं। पहली नज़र में ऐसा भ्रम होता है मानो किसी ने मोटे हरे रेशमी धागों की कोई झालर टांक दी हो, लेकिन यह कोई साधारण सजावट नहीं, बल्कि अस्तित्व की रक्षा का एक चतुर और सूझबूझ भरा सुरक्षा उपाय है। यह ‘ब्लू मैनाकिन’ पक्षी का घोंसला है, जिसने हाल ही में जीव विज्ञानियों को चकित किया है।

ब्लू मैनाकिन का घोंसला ऊपर से छोटा और प्यालेनुमा होता है, लेकिन इसके नीचे लटकती काई और रेशों की लंबी ‘पूँछ’ इसे अद्वितीय बनाती है। हवा में लहराती ये लटें दरअसल एक सुरक्षा कवच का काम करती हैं। इस पूँछ की लंबाई कभी-कभी दो मीटर तक पहुँच जाती है। हाल ही में विज्ञान पत्रिका ‘बायलॉजी लैटर्स’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, बड़े शिकारी पक्षी इन लटों को देख तो लेते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि इनके शीर्ष पर घोंसला भी हो सकता है।

दरअसल, घोंसले का जाना-पहचाना गोल आकार इन बिखरी हुई रेखाओं के बीच पूरी तरह लुप्त-सा जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘डिस्रप्टिव कैमुफ्लाज’ (विघटनकारी छलावरण) कहते हैं - एक ऐसा दृश्य-भ्रम जहाँ असली आकृति अपनी पहचान खोकर प्राकृतिक परिवेश में विलीन हो जाती है। एक प्रयोग में शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों की ये लटकती पूँछें हटा दीं और कुछ को यथावत रहने दिया। परिणाम चौंकाने वाले थे जिन घोंसलों की पूँछ नहीं थी, उन पर शिकारियों के लगभग दस गुना अधिक हमले हुए। प्रयोग से यह प्रमाणित हुआ है कि प्रकृति में कभी-कभी ‘दिखना’ ही ‘छिपने’ का सबसे सुरक्षित तरीका होता है।

बया : वास्तुकला की बेजोड़ किलेबंदी

भारतीय परिवेश में यदि पक्षियों के कलात्मक कौशल की बात हो, तो नन्हे ‘बया’ का नाम सर्वोपरि है। बया का घोंसला किसी कलात्मक उल्टे लटके थैले जैसा दिखता है, जिसे वह टहनियों के सबसे लचीले और संकरे सिरों पर बड़ी कुशलता से बुनती है। बया के घोंसले का असली रहस्य इसकी लंबी और संकरी प्रवेश सुरंग में छिपा है। जब कोई सांप या शिकारी पक्षी अंदर पहुंचने का प्रयास करता है, तो उसे इस झूलती हुई संकरी नली से गुजरना पड़ता है। चूंकि घोंसला अत्यंत लचीली टहनी पर होता है, शिकारी का भारी वजन उसे हिला देता है और वह अपना संतुलन खोकर नीचे गिर जाता है। जहाँ मैनाकिन शिकारी को मनोवैज्ञानिक भ्रम में छकाती है, वहीं बया अपनी संरचनात्मक बुनावट से शिकारी के लिए रास्ता ही दुर्गम और असंभव बना देती है।

रक्षा के दो बेजोड़ दर्शन: एक नजर में

प्रकृति ने इन नन्हें पक्षियों को जो ‘सर्वाइवल स्किल्स’ दी हैं, वे उनकी बुद्धिमत्ता का जीवंत प्रमाण हैं। जहां ब्राजील की ब्लू मैनाकिन दृश्य-भ्रम पर भरोसा करती है, वहीं भारतीय बया अपनी सुरक्षा के लिए जटिल वास्तुकला का सहारा लेती है। मैनाकिन की लंबी पूंछ घोंसले के वजूद को शिकारी की नजरों से ओझल करने वाला पर्दा है, तो बया का शिल्प कौशल एक ऐसा फिल्टर है, जहां से यह पक्षी खुद तो अंदर आ-जा सकता है, लेकिन बड़े सांप या शिकारी पक्षी संतुलन खोकर नीचे गिर जाते हैं।  

गंध और दृष्टि का संतुलन

दिलचस्प तथ्य यह है कि मैनाकिन की यह तकनीक केवल उन शिकारियों पर प्रभावी है जो दृष्टि का इस्तेमाल करते हैं। साँप या छोटे स्तनधारी शिकारी जो गंध से शिकार तलाशते हैं, उनके लिए यह पक्षी एक और युक्ति अपनाता है। ये अपने घोंसले जलस्रोतों के ठीक ऊपर लटकी पतली टहनियों पर बनाते हैं, जहाँ गंध का पीछा करने वाले जीवों के लिए पहुँचना लगभग नामुमकिन होता है।

कल्पनाशीलता ही सबसे बड़ी शक्ति

घोंसला पक्षियों के शिशुओं के लिए केवल आश्रय नहीं, बल्कि एक विकसित और सूझबूझभरा अनुकूलन है। इन नन्हें परिंदों की दुनिया हमें सिखाती है कि सुरक्षा के लिए हमेशा शारीरिक शक्ति की आवश्यकता नहीं होती। कभी सूझबूझ भरी बुद्धिमानी, तो कभी समझदारी से बुना गया शिल्प ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन जाता है। मैनाकिन की लहराती पूंछें हों या बया की सूक्ष्म कलाकारी, जिसमें हर तिनका जीवन की रक्षा के विज्ञान से जुड़ा है। ये जीव अपने सीमित संसाधनों से ऐसी रणनीतियां विकसित करते हैं, जो आधुनिक सुरक्षा-डिज़ाइन की अवधारणाओं को भी प्रेरित कर सकती हैं। अंततः यह संघर्ष केवल परिंदों का नहीं, बल्कि इस सार्वभौमिक सत्य का है कि अस्तित्व की लड़ाई में कल्पनाशीलता ही सबसे बड़ी शक्ति है।