जंगल से सड़क तक मानव-वन्य जीव संघर्ष
पिछले सप्ताह खीरी जिले में घटित तीन प्रमुख मानव वन्य जीव संघर्ष ने मानव जीवन में हलचल मचा दी है। पहली घटना धौरहरा वन रेंज की है, जहां खेत में घुसे तेंदुए ने किसान को लहू लुहान कर दिया। दूसरी घटना भी खीरी जिले के कोतवाली तिकुनिया के बनवीरपुर गांव की है ,जहां युवक को तेंदुए ने घायल कर दिया। तीसरी घटना महेशपुर वनरेंज के नंदलालपुर गांव की है, जहां बाघ के हमले में युवक की मौत हो गई और यह तीनों घटनाएं एक ही दिन में घटित हुई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि मानव वन्य जीव संघर्ष कितना घातक रूप से बढ़ता ही जा रहा है।
स्थिति यह है कि लोग खेतों में जाने से कतरा रहे हैं। आशंका है किसी समय तेंदुए या वन्य जीव हमले की ,लेकिन क्या? यह सब स्थितियां एक दिन में पैदा हो गई तो इसका उत्तर है नहीं, बल्कि अनुचित एवं अनवरत मानवीय क्रियाकलापों ने यह स्थिति पैदा की है, जिससे मानव वन्य जीव संघर्ष की यह नई इबादत तैयार हो रही है और दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। वस्तुत: मानव- वन्य जीव संघर्ष तब होता है, जब जंगली जानवरों और इंसानों के बीच नकारात्मक अंतः क्रिया होती है, आइए इसके कारणो का विश्लेषण करते हैं, कि आखिरकार यह संघर्ष क्यों और कैसे पैदा हुआ?
पहला कारण है, कि तेजी से बढ़ता हुआ शहरीकरण इसके लिए जिम्मेदार है ,क्योंकि जहां पर शहर बस जाता है वहां पर वन लगभग शून्य ही रहता है, ऐसे में इन वन्य जीवों के लिए रहना ,भोजन ,पानी इत्यादि आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है ,इससे वन्य जीव मानव बस्तियों में आना शुरू कर देते हैं, जिससे मानव वन्य जीव संघर्ष प्रारंभ होता है।
दूसरा प्रमुख कारण मानव वन्य जीव संघर्ष का है ,कृषि विस्तार के लिए वनों की कटाई बढ़ता शहरीकरण खेतों को लीलता जा रहा है ,वहीं उन्हीं खेतों की पूर्ति के लिए लगातार जंगल काटे जा रहे हैं। जंगलों के काटे जाने से जंगल लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं, जिससे इन वन्य जीवों को मानव बस्तियों में आना पड़ रहा है, फल स्वरुप मानव वन्य जीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है।
तीसरा कारण है, बढ़ती जनसंख्या। बढ़ती जनसंख्या के कारण आज मानव बस्तियां जंगलों के काफी समीप पहुंच गई हैं। पहले वह जंगलों से बहुत दूर हुआ करती थी ।फल स्वरुप मानव का हस्तक्षेप वनों में अधिक हो रहा है। तमाम शिकारी वनों में शिकार करने चले जाते हैं, जिससे इन वन्य जीवो को वनों में शिकार नहीं मिल पाते हैं ।जंगलों में शिकार न मिल पाने के कारण अपनी भूख मिटाने के लिए यह वन्य जीव मानव बस्तियों की ओर रुक कर रहे हैं, जिससे मानव वन्य जीव संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है।
बढ़ता विकास भी इसका एक कारण है। कुछ दिनो पूर्व मैंने अपने एक लेख में जिसका शीर्षक था ‘खाली होते गांव और बड़े होते शहर मे’ मैंने बताया था किस प्रकार शहरो की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे सरकार को विकास की गति देने के लिए अनेक नए राजमार्गों का निर्माण करना पड़ रहा है ,ऐसा विकास शहरों में आवागमन के लिए जरूरी भी है ,लेकिन यह विकास खेतों को लगातार छोटा कर रहा है। जब सड़कों का चौड़ीकरण होता है या नए राजमार्ग निकाल जाते हैं ,तो बहुत बड़ी मात्रा में वनों की कटाई होती है ,जिससे वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास लगातार सिकुड़ रहे हैं ,आवासों के सिकुड़ने से उनके संसाधनों में कमी आ रही है, जिससे वन्य जीवो का आवागमन मानव बस्तियों में लगातार बढ़ता जा रहा है। मानव- वन्य जीव संघर्ष का दुष्परिणाम आए दिन सामने आ रहे हैं ।बाघ, तेंदुए मानव बस्तियों में घूमते नजर आ रहे हैं ,जिससे मानव जीवन को खतरा है। मानव वन्य जीव संघर्ष में मौत का आंकड़ा भी बढ़ रहा है।
दूसरा दुष्प्रभाव फसल और पशुधन पर पड़ रहा है। बाघ और तेंदुए गांवो में भैंसो एवं गायों का शिकार कर रहे हैं ।पलिया वन रेंज में आधे से ज्यादा गन्ने की फसल हाथियों द्वारा रौद दी जाती है ,जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है इस प्रकार इस संघर्ष से फसल पशुधन मानव जाति सभी को गंभीर खतरा है।
इस समस्या के निराकरण में पहला कदम यह होना चाहिए कि वनों की कटाई पर रोक लगाई जाए, इससे उनके प्राकृतिक आवास बचे रहेंगे। दूसरा उपाय यह है कि राजमार्गों इत्यादि को वन क्षेत्र से न गुजारा जाए हो सके तो उन्हें, मानव बस्तियों से ले जाया जाए ,इससे जहां एक ओर मानव को सुविधा होगी ,वहीं दूसरी और जंगल सुरक्षित रहने से वन्य जीवों का आवागमन मानव बस्तियों की ओर रुकेगा ।तीसरा उपाय है,यह है कि प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग सक्रिय रहे ,और ड्रोन कैमरे से इन पर नजर रखी जाए और वनों में उनके प्राकृतिक आवासों को प्राकृतिक तरीके से सुसज्जित किया जाए ताकि यह वन में रहे।
