जिंदगी का सफर

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Published By Anjali Singh
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होली के हिंदी फिल्मी गीतों के संग्रह में शायद ही किसी के पसंदीदा गानों में ‘जोगी जी धीरे-धीरे...’ न हो! इसे या ‘नदिया के पार’ के अन्य गीतों को सुनते हुए अक्सर ख्याल आता था कि भारत के पूर्वी क्षेत्र की मिठास लिए यह सरल, जादुई आवाज किसकी है, जो यूपी-बिहार के गांवों की भाषा और भावों को इतनी सहज और सुंदर अभिव्यक्ति देती है।

फिर जब यह पता चला कि यह मधुर आवाज एक पंजाबी गायक जसपाल सिंह जी की है तो और ताज्जुब होना ही था। एक पंजाबी पृष्ठभूमि की आवाज और भारत के पूर्वी क्षेत्र की भाषाई मिठास इतनी खूबसूरती से संजोये हुए। फिर लगा शायद हिंदी क्षेत्र से कोई संबंध रहा हो। मगर ऐसा भी कोई उल्लेख कहीं मिला नहीं। 

उनका जन्म 23 मार्च 1943 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उन्हें स्कूल और कॉलेज के दिनों में ही गायन का शौक हो गया था। वे पढ़ाई के दौरान कई संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे। जसपाल जी मोहम्मद रफी साहब के बहुत बड़े प्रशंसक थे और बचपन से ही उनके गाने-सुनते और मौका मिलते ही गाते थे।  गायन के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए वे मुंबई चले गए, जहां उनकी बहन रहती थीं।

उनकी प्रतिभा को सर्वप्रथम 1968 में प्रसिद्ध महिला गायिका और संगीतकार ऊषा खन्ना जी ने पहचाना और पहला ब्रेक दिया। इनके संगीत निर्देशन में इन्होंने ‘बंदिश’ और ‘अनजान है कोई’ फिल्मों में गाने गए। मगर न इन फिल्मों को ज्यादा सफलता मिली न इन्हें कोई विशेष पहचान। मगर इनका सही वक्त अभी आना शेष था। राजश्री की फिल्म ‘गीत गाता चल’ में संगीतकार रविन्द्र जैन जी के निर्देशन में उनकी आवाज पूरे देश में छा गई। इसके बाद उन्होंने ‘नदिया के पार’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘सावन को आने दो’ जैसी कई हिट बॉलीवुड फिल्मों के लिए गाया।

चूंकि उस समय के सभी ख्यात गायक अलग-अलग लोकप्रिय नायकों के साथ जुड़े हुए थे। इस कारण नायक सचिन को ब्रेक देने वाली आवाज के रूप में पार्श्व गायन करने के लिए नए गायक जसपाल सिंह को चुना गया था। मगर यह सफलता उनके राह की बाधा भी बन गई। नायक के रूप में सचिन का कैरियर बहुत सफल और लंबा नहीं रहा, जबकि जसपाल जी सचिन की आवाज के रूप में सीमित पहचान में बंधते चले गए। आने वाला दौर हिंदी सिनेमा में पार्श्व गायन के स्तर में गिरावट का भी रहा, जो जसपाल जी जैसे प्रतिभावान गायकों के लिए अनुकूल नहीं रहा और वो इस नए दौर में गुमनामी में खोते गए।

उनके कंठ से निकले कुछ यादगार गीतों में-धरती मेरी माता, पिता आसमान, गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल, मंगल भवन अमंगल हारी (फिल्म- गीत गाता चल), कौन दिशा में लेके चला रे, साची कंहे तोरे आवन से हमरे (फिल्म-  नदिया के पार), जब-जब तू मेरे सामने आए (फिल्म- श्याम तेरे कितने नाम), सावन को आने दो (फिल्म- सावन को आने दो) आदि शामिल हैं।  सफलता-असफलता से परे उनके दिल से गाए गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हैं और आगे भी उनकी उपस्थिति का अहसास बन फिजाओं में गूंजते रहेंगे।- अभिषेक मिश्रा

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