मर्यादा, करुणा और आदर्श के शाश्वत प्रतीक श्रीराम
गोस्वामी जी लिखा है- विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। उल्लेख मिलता है कि इक्ष्वाकु वंशीय, अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ ने चौथेपन में पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ किया, जिसके फलस्वरूप श्रीहरि के सातवें अवतार के रूप में श्रीरामचंद्र उनको पुत्र-रूप में प्राप्त हुए। एक मां के ममत्व की दृष्टि से रानी कौशल्या ने प्रगट हुए श्रीहरि के विशायकाय रूप को देखकर अनुरोध किया कि आप मेरे गर्भ से जन्म लेकर शिशु-लीला कीजिए। मेरे वात्सल्य-स्नेह की पूर्णता तो आपके बालरूप में ही प्राप्त होगी। इस संदर्भ में कौशल्या सहित अन्य समस्त नारी समाज के लिए भी यह अवसर उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और सार्थकता प्रदान करने वाला होता है, जब वह मां बनती हैं। तदनंतर श्रीहरि कौशल्या के गोद में नवजात शिशु की भांति चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, तिथि नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न की शुभ मुहूर्तबेला में जन्म लेते हैं। यही दिन चैत्र नवरात्रि के पवित्र दिवस (नवमी) शक्ति उपासना-आराधना के विराम का भी होता है।
रामकथा में वनवास- प्रसंग को मूलत: संसारी जीवों के अनेक उतार-चढ़ाव, उथल-पुथल और झंझावातों के बीच से संतुलन बनाकर निकलने के सांकेतिक निष्कर्ष के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए, जिसे प्रभु राम भरपूर, सानंद जीते हैं तथा 14 वर्ष के दीर्घ अंतराल तक तापस-वेष में जंगल-जंगल घूमने वाले श्रीराम स्वयं में इस यथार्थ के प्रतीक हैं कि अपने-अपने हिस्से का वनवास तो सबको स्वयं ही काटना पड़ेगा। अपने हालात पर किसी को दोष न देना और सत्साहस से उसका मुकाबला करते हुए परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेने का सबक उन्हीं से सीखना चाहिए। कंटकाकीर्ण पथ पर आम व खास सब एक समान हैं। अपने कर्म व प्रारब्ध की गति पर पर सभी को तैयार रहना चाहिये,चाहे वह कोई भी हो।
रामजी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण व ग्रहणीय पक्ष यही है कि आप जीवन को दीन-दुखियों, जरूरतमंदों और हाशिये पर जी रहे लाखों लोगों के लिए प्रेरक कैसे बन सकते हैं। उनको मुख्यधारा में लाकर सम्मानित जीवन का उजाला कैसे प्रदान कर सकते हैं। श्रीराम ने चौदह वर्ष के जंगल-प्रवास को इसी संकल्प के साथ जिया। चाहे वह केवटराज को अपने स्नेह से अत्यंत प्रिय बना लेना हो, चाहे जनम-जनम से हरिदर्शन की भूखी एकनिष्ठ स्नेही-शबरी की कुटिया में जाकर उनके जूठे बैर खाना हो या वानर जाति, जो एक से दूसरी शाखा पर उछलकूद करके जीवन गुजार देते हैं, उनसे मैत्री कर भार्या सीता की खोज व प्राप्ति का पूरा श्रेय उन्हें देने का हो। श्रीराम की यह भिन्न -भिन्न गुण, धर्म, जाति व संस्कृति के साथ सर्वग्राहकता अद्भुत और अनूठी है।
राजा न होते हुए भी उन्होंने सबको एक मंच पर अन्याय के विरुद्ध एकत्र कर लिया। लंकाधिपति को अयोध्या या अन्य राजाओं की सैन्य मदद से भी परास्त किया जा सकता था,परंतु राम जी ने ऐसा नहीं किया। कारण स्पष्ट है उन्होंने बिखरी हुई जनशक्ति को सही दिशा दी। महाबली के घमंड को माटी में मिलाना गुणनिधान के उसी चिंतन का प्रतिफल है। राम रथविहीन हैं, वानरों की सेना के सहारे, तापस वेषधारी हैं, सैन्य साजोसामान से वंचित हैं, किंतु स्त्री-अस्मिता की लड़ाई के लिए जो साहस और इरादे की जरूरत होती है, उनमें भरी हुई है। संपूर्ण रामकथा को पढ़ाते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि वे अंतिम समय तक युद्ध को टालते के विकल्पों पर विचार विमर्श करते रहे।
आज पूरी दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, चंद सिरफिरों के अहंकार और वर्चस्व की आग में खाड़ी के कई देश जल रहे हैं। ऐसे में राम का चरित्र,राम का आचरण और उनकी महानता से अहंकारी और लालची देशों को सबक लेना चाहिए कि उन्होंने जो अपनी ताकत इकट्ठा कर रखी है,वह दूसरे को भयभीत करने में नहीं; परस्पर सहयोग वह सामंजस्य में ही उसका सदुपयोग करें। हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम राजाओं-महाराजाओं के ऐश्वर्यवादी जीवन से दूर केवल एक पत्नीव्रती हैं।
पत्नी को सुरक्षित कैद से मुक्ति दिलाने हेतु रावण के एक लाख पूत सवा लाख नाती , ता रावन घर दिया न बाती की कहावत को उन्होंने चरितार्थ किया। सत्य की इसी स्थापना की पूर्ति के लिए ही तो उनका अवतार हुआ था ।वे तभी तो जन-जन के प्रिय और आदर्श बन गये। जानकी के कण्ठाभूषण और प्रजापालक ऐसे कि प्रजा के सवाल खड़ा करने पर बिना देर किये उसी प्राणबल्लभा जानकी को त्यागने मे तत्पर हो गये। यह किसी और राजा-महाराजा के वश की बात नहीं, प्रजा को प्राणों की तरह मानने वाले प्रभु राम प्राण-प्यारी माता सीता को भी निर्वासन देने में नहीं हिचके। वस्तुत: आज के समय में जो अपनी प्रजा (जनमानस) की आर्त-पुकार अनसुना कर दे, उसे श्रीराम को हृदयंगम करना चाहिए।-संतोष कुमार तिवारी, नैनीताल
