मां बाल सुंदरी मंदिर: काशीपुर का चमत्कारी शक्तिपीठ जहां गिरी थी सती मां की बायीं भुजा

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Published By Muskan Dixit
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कुंदन बिष्ट, काशीपुरः ऊधम सिंह नगर के काशीपुर में कुंडेश्वरी मार्ग पर मां बाल सुंदरी मंदिर स्थित है। यह 52 शक्तिपीठों में से एक है। माता का यह नाम उनके द्वारा बाल रूप में की गई लीलाओं की वजह से पड़ा है। इसे पूर्व में उज्जैनी एवं उनकी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता था। यहां प्रतिवर्ष चैत्र मास की नवरात्रि में चैती मेले का आयोजन किया जाता है। धार्मिक एवं पौराणिक काल में इसे गोविषाण नाम से भी जाना जाता था। महाभारत काल का इतिहास समेटे काशीपुर में मुगल शासक औरंगजेब जैसे मूर्तिभंजक शासक को नतमस्तक होना पड़ा था। यहां उज्जैनी शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध मां भगवती बाल सुंदरी का मंदिर शक्तिपीठ भी माना जाता है। किवदंतियां है कि औरंगजेब की बहन का स्वास्थ्य खराब हुआ, तो मां बाल सुंदरी ने उनकी बहन को सपने में दर्शन दिये। तब उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

मंदिर में गिरी थी माता सती की बायीं भुजा

मुख्य पंडा विकास कुमार अग्निहोत्री ने बताया कि चैती परिसर में भगवान विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को काट दिये जाने के बाद माता की बायीं भुजा यहां गिरी थी। तब यहां माता की कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक शिला पर उनकी बायीं भुजा की आकृति गढी हुई है। जिसकी श्रद्धालु पूजा करते हैं।

अष्टमी से उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

मुख्य पंडा विकास बताते हैं कि शाक्य संप्रदाय से संबंधित अधिकांश मंदिरों में नवरात्रि में मेले लगते हैं। इसी तरह मां बाल सुंदरी मंदिर भी नवरात्रि में अष्टमी, नवमी व दशमी के दिन श्रद्धालुओं की भारी संख्या में भीड़ उमड़ती है। माता पक्काकोट मंदिर से सप्तमी की अर्धरात्रि को पहुंचती हैं।

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मंदिर परिसर में स्थित है खोखला कदंब वृक्ष

लोक मान्यता अनुसार जो लोग इस मंदिर के वर्तमान पंडा है, उनके पूर्वज मुगलों के समय से यहां आए थे, तभी से मां बाल सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। इस मंदिर परिसर में एक कदंब वट, पीपल आदि के पेड़ स्थित हैं। कदंब का तना और पतली टहनी तक सब खोखला है। पंडा पेड़ के संबंध में मान्यता बताते हैं कि एक बार एक महात्मा आए उन्होंने मंदिर के पंडा को शक्ति दिखाने को कहा तो पंडा ने कदंब के पेड़ पर सरसों मारी तो पेड़ तुरंत सूख गया। उन्होंने फिर उसे हरा करने को कहा तो पंडा ने पानी छिड़का, इसके बाद पेड़ हरा हो गया, लेकिन पेड़ खोखला रह गया।

जहांआरा के सपनों में आई थीं मां बाल सुंदरी

औरंगजेब की बहन जहांआरा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। औरंगजेब ने बड़े-बड़े वैद्य और हकीमों को बुलाया, लेकिन उसकी बहन पर दवाओं का कोई असर नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद औरंगजेब की बहन के सपने में मां बाल सुंदरी ने बाल रूप में दर्शन दिए। मां ने सपने में आकर कहा कि उसका भाई औरंगजेब मंदिर का जीर्णोद्धार कराए तो वह पूरी तरह से स्वस्थ हो जाएगी। अगले दिन यह बात जहाँआरा ने औरंगजेब को बताई। जिसके बाद औरंगजेब ने तुरंत मंदिर के लिए अपने श्रमिक भेजकर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर के ऊपर बनी मस्जिद नुमा आकृति एवं तीन गुंबद इस बात को प्रमाणित करते हैं।

बुक्सा जनजाति की कुलदेवी  

चैती मंदिर के मुख्य पंडा बताते हैं कि आदि शक्ति की बाल रूप में पूजा होने के कारण ही इसे बाल सुंदरी कहा जाता है। मां बाल सुंदरी बुक्सा समाज की कुलदेवी है। आज भी बुक्सा समाज के लोग वर्ष में एक बार माता की विधिवत पूजा करने आते हैं और जागरण व भंडारे का आयोजन करते हैं। बताया कि गदरपुर, बाजपुर और रामनगर में बुक्सा समाज के लोग रह रहे हैं। माघ से फाल्गुन तक इन गांव के प्रत्येक घर में चिरागी (पूजा) कर उठावनी होती है। बुक्सा समाज के लोग चैत्र नवरात्र में अष्टमी, नवमी, दशमी पर पूजा अर्चना कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

डाकू सुल्ताना से लेकर फुलन देवी तक आते थे नखासा बाजार में घोड़े खरीदने

चैती मेले में लगे आ रहे नखासा बाजार का भी अपना इतिहास है। मुख्य पंडा विकास अग्निहोत्री के मुताबिक पंडा परिवार नौ पीढ़ियों से भी अधिक माता की सेवा करता आ रहा है। इस दौरान लगने वाले चैती मेले में नखासा बाजार भी लगता था। जहां राजस्थान, गुजरात समेत यूपी के अन्य जगहों से घोड़ों की कई तरह की नस्ल बेचने को लाई जाती थी। पंडा अग्निहोत्री ने बताया कि नखासा बाजार में मशहूर डाकू सुल्ताना और फूलन देवी भी घोड़े खरीदने आया करते थे।

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मेले में बरेली और झारखंड की लाठी है मशहूर

चैती मेले में एक दशक पूर्व तक लाठी-डंडों का बाजार खासा प्रसिद्ध था। लोग सालभर इसका इंतजार करते थे। खासतौर पर बरेली और झारखंड की लाठियां मशहूर थी। लाठी कारोबारी वहां से लाठी थोक में लेकर आते थे।

हाईकोर्ट के बाद बलि प्रथा पर लगी रोक

चैती मेला में मां बाल सुंदरी से मन्नतें मांगने वाले लोग मन्नत पूरी होने पर बकरों की बलि देते थे, लेकिन वर्ष 2009 में उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा बलि प्रथा पर रोक लगाने के बाद मंदिर में बलि प्रथा पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। हालांकि लोग आज भी मन्नते पूरी होने पर बकरे लाते हैं, लेकिन उन्हें छोड़ जाते हैं।

समय के साथ मंदिर का किया जा रहा जीर्णोद्धार

जैसे-जैसे समय गुजरता गया मंदिर का भी जीर्णोद्धार होता रहा। आज मंदिर का स्वरूप कई हद तक बदल गया है। मुख्य पंडा विकास के मुताबिक इस बार श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर परिसर में यात्रियों की सुविधा के लिए दो नए यात्री निवास बनाए गए हैं, जहां श्रद्धालु निशुल्क ठहर सकेंगे। इन यात्री निवासों में पंखों सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। साथ ही मुंडन संस्कार के लिए एक बड़ा हॉल भी तैयार किया जा रहा है, ताकि छोटे बच्चों और उनके परिवारों को भीड़भाड़ से अलग व्यवस्थित स्थान मिल सके। इसके साथ मंदिर के दक्षिण द्वार के पास श्रद्धालुओं के लिए एक नया प्याऊ बनाया जा रहा है। इसके लिए करीब 300 फुट गहरा बोर कराया गया है।

बंटवारे के बाद बची कम भूमि

पंडा परिवार के भूमि बंटवारे के बाद चैती मंदिर में लगने वाले मेले के लिये अब पहले से कम भूमि बची है। खासतौर पर जिस स्थान पर नखासा बाजार लगता था। वहां लगभग कई निर्माण हो चुके हैं।

वर्ष 2018 से मेले का आयोजन करा रहा प्रशासन

वर्ष 2018 से पूर्व मंदिर के पंडाओं द्वारा मेले का आयोजन किया जाता था, लेकिन वर्ष 2018 के बाद प्रशासन मेले का आयोजन कर रहा है। हालांकि मेले का आयोजन कौन करेगा इसका वाद हाईकोर्ट में अभी भी विचाराधीन चल रहा है। लेकिन प्रशासन के मेला आयोजन करने के बाद दुकानदारों को मेले में दुकाने लेने के लिये भारी कीमतें चुकानी पड़ रही है।

12 वां उप ज्योतिर्लिंग

चैती मैदान परिसर में ही महाभारत कालीन मोटेश्वर महादेव मंदिर का शिवलिंग 12 वां उप ज्योतिर्लिंग है। शिवलिंग की मोटाई अधिक होने के कारण यह मोटेश्वर महादेव मंदिर के नाम से विख्यात है। स्कंद पुराण में भगवान शिव ने कहा कि जो भक्त कांवड़ कंधे पर रखकर हरिद्वार से गंगा जल लाकर यहां चढ़ाएगा उसे मोक्ष मिलेगा।

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