वैज्ञानिक फैक्ट:पृथ्वी पर ऑक्सीजन का उत्पादन और महासागर 

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Published By Anjali Singh
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क्या आपने कभी सोचा है कि ऑक्सीजन आखिर आती कहां से है? आमतौर पर हमारा ध्यान घने वर्षावनों, विशेषकर अमेज़न जैसे क्षेत्रों की ओर जाता है, जिन्हें “पृथ्वी के फेफड़े” कहा जाता है। लेकिन एक रोचक वैज्ञानिक तथ्य यह है कि पृथ्वी पर उपलब्ध ऑक्सीजन का एक बहुत बड़ा हिस्सा समुद्रों से आता है। वैज्ञानिकों और समुद्री अनुसंधानों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर उत्पादित ऑक्सीजन का लगभग 50 से 60 प्रतिशत भाग महासागरों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों द्वारा निर्मित होता है।

समुद्रों में पाए जाने वाले फाइटोप्लवक, सूक्ष्म शैवाल  और सायनोबैक्टीरिया जैसे जीव प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य के प्रकाश का उपयोग कर ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं। ये जीव आकार में अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, लेकिन संख्या में इतने विशाल होते हैं कि उनका सामूहिक योगदान पूरे ग्रह के वायुमंडलीय संतुलन को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
 
विशेष रूप से ‘प्रोक्लोरोकोकस’ नामक सूक्ष्म जीव को पृथ्वी का सबसे अधिक मात्रा में ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाला जीव माना जाता है। यह अकेला ही वैश्विक ऑक्सीजन उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसके अतिरिक्त, समुद्री शैवाल की बड़ी प्रजातियाँ, जैसे केल्प, भी तटीय क्षेत्रों में ऑक्सीजन उत्पादन और कार्बन अवशोषण में अहम भूमिका निभाती हैं।

महासागर केवल ऑक्सीजन ही नहीं बनाते, बल्कि वे पृथ्वी के जलवायु तंत्र को भी नियंत्रित करते हैं। ये समुद्री जीव कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे जैविक पदार्थ में परिवर्तित करते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव कम होता है। इसे ‘ब्लू कार्बन’ प्रक्रिया कहा जाता है, जो जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हालांकि, यह संतुलन अब खतरे में है। समुद्री प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, महासागरों का तापमान बढ़ना और अम्लीकरण इन सूक्ष्म जीवों के अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। यदि फाइटोप्लवक की संख्या में कमी आती है, तो इसका सीधा प्रभाव वैश्विक ऑक्सीजन उत्पादन और जलवायु संतुलन पर पड़ेगा। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि ऑक्सीजन केवल जंगलों से ही नहीं, बल्कि महासागरों की गहराइयों में बसे सूक्ष्म जीवन से भी आती है। यह ज्ञान हमें पर्यावरण संरक्षण की व्यापक दृष्टि अपनाने के लिए प्रेरित करता है, जिसमें समुद्रों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी वनों की।