पौराणिक कथा: राजा का टूटा अहंकार
प्राचीन काल में धर्मपाल नाम के एक पराक्रमी और न्यायप्रिय राजा हुए। उन्हें अपने न्याय पर बड़ा गर्व था। उन्होंने अपने राज्य में एक नियम बना रखा था कि कोई भी व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर सीधे राजा के पास आ सकता है। राजा को विश्वास था कि पूरे आर्यावर्त में उनसे अधिक न्यायप्रिय और बुद्धिमान शासक कोई नहीं है। एक दिन संध्या के समय, जब सूर्य अस्त होने को था और राजदरबार की कार्यवाही समाप्त होने वाली थी, तभी फटे-पुराने कपड़ों में लिपटी एक वृद्ध महिला दरबार में पहुंची। उसके चेहरे पर थकान और भूख साफ झलक रही थी।
राजा ने उसे आदर से बैठने को कहा और उसकी समस्या पूछी। बुढ़िया ने धीमी आवाज में कहा, “महाराज, मैं बहुत भूखी हूं। मुझे बस दो मुट्ठी अनाज चाहिए, लेकिन वह अनाज आपके ‘पुण्य’ की कमाई का होना चाहिए, न कि कर के रूप में प्रजा से लिया गया।” यह सुनकर राजा मुस्कुराए और आत्मविश्वास से बोले, “माता, मैंने अपना पूरा जीवन प्रजा की सेवा में बिताया है। अनेक यज्ञ किए हैं, गरीबों को दान दिया है और न्याय किया है। क्या यह सब पुण्य नहीं है?” बुढ़िया ने अपने थैले से एक छोटी तराजू निकाली। उसने एक पलड़े में एक सूखा पत्ता रखा और बोली, “महाराज, यदि आपके किसी भी एक नि:स्वार्थ कर्म का वजन इस सूखे पत्ते से अधिक हो जाए, तो मैं मान लूंगी कि वह अनाज आपके सच्चे पुण्य से मिला है।”
राजा को यह चुनौती बहुत सरल लगी। उन्होंने अपने सबसे बड़े दान का प्रमाण पत्र पलड़े में रखा, लेकिन पत्ता ज्यों का त्यों रहा। फिर उन्होंने सौ गायों के दान का संकल्प रखा, मगर पत्ता हिला तक नहीं। राजा हैरान रह गए। उन्होंने अपनी तलवार, अपना मुकुट और यहां तक कि अपने वंश की प्रतिष्ठा तक उस पलड़े पर रख दी, परंतु वह सूखा पत्ता अडिग रहा। अब राजा का घमंड टूटने लगा। अंततः वे हार मानकर बुढ़िया के चरणों में गिर पड़े।
उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। वे बोले, “माता, शायद मैंने जो भी किया, उसमें कहीं न कहीं अहंकार रहा होगा। मुझे क्षमा करें, मेरे पास ऐसा कोई पुण्य नहीं जो पूरी तरह नि:स्वार्थ हो।” जैसे ही राजा का एक आंसू तराजू के पलड़े पर गिरा, अचानक वह सूखा पत्ता हवा में उड़ गया और पलड़ा राजा के पश्चाताप के भार से झुक गया। तभी वह बुढ़िया दिव्य प्रकाश में बदल गई और बोली, “राजन, जब तक तुम्हारे कर्मों में ‘मैं’ का अहंकार था, तब तक उनका कोई वजन नहीं था, लेकिन जब तुमने अपनी भूल स्वीकार की और विनम्र हो गए, तब तुम्हारा वह एक आंसू सारे दानों से अधिक मूल्यवान हो गया।”
