लोकायन: साल के फूलों संग खिलता सरहुल का उल्लास
झारखंड और उसके आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहारों में से एक है। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। सरहुल के माध्यम से आदिवासी समुदाय प्रकृति, पृथ्वी और सूर्य के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हैं। इस अवसर पर साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक गीत-नृत्य और सामूहिक भोज का विशेष महत्व होता है।
झारखंड के उरांव, मुंडा तथा अन्य आदिवासी समुदाय इस पर्व को बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं, जिससे गांवों में आनंद और उत्सव का वातावरण बन जाता है। ‘सरहुल’ शब्द की उत्पत्ति भी प्रकृति से ही जुड़ी है। यह दो शब्दों- ‘सर’ या ‘सराय’ और ‘हुल’ से मिलकर बना है। ‘सर’ या ‘सराय’ का अर्थ साल का पेड़ (शोरिया रोबस्टा) होता है, जबकि ‘हुल’ का मतलब होता है सामूहिक उत्सव या आनंद का अवसर। इस प्रकार सरहुल का अर्थ है साल वृक्ष के माध्यम से प्रकृति का सामूहिक उत्सव मनाना।
लोकमान्यताओं के अनुसार यह पर्व पृथ्वी और सूर्य के प्रतीकात्मक विवाह का भी संकेत देता है। इसी कारण इस दिन लोग सरना स्थल या पवित्र वृक्ष के नीचे पूजा-अर्चना करते हुए प्रकृति से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। सरहुल पर्व अलग-अलग जनजातीय समुदायों में अलग नामों से भी जाना जाता है। उरांव सरना समाज में इसे ‘खद्दी’ या ‘खेखेल बेंजा’ कहा जाता है। हालांकि विभिन्न समुदायों में इसकी परंपराओं और अनुष्ठानों में थोड़ी भिन्नता दिखाई देती है, लेकिन प्रकृति की पूजा और सामूहिक उत्सव इसकी मूल भावना बनी रहती है।
इस पर्व की तैयारियां लगभग एक सप्ताह पहले से ही शुरू हो जाती हैं। गांव के पाहन यानी पुजारी इस अवसर से पहले उपवास रखते हैं। पर्व के दिन सुबह सूर्योदय से पहले दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर सरना स्थल पर अर्पित किया जाता है। इसके बाद साल के वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव की खुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है। इस पूजा में मां सरना, सूर्य देवता, ग्राम देवताओं और पूर्वजों को स्मरण किया जाता है।
पूजा के बाद उत्सव का रंग और भी गहरा हो जाता है। आदिवासी समुदाय के लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं और गांव के अखड़ा में सामूहिक नृत्य करते हैं। महिलाएं और पुरुष साल के फूलों से स्वयं को सजाते हैं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर नृत्य-गीत का आनंद लेते हैं। इस दौरान चावल से बने पारंपरिक पेय ‘हांडिया’ का सेवन भी किया जाता है। दरअसल, सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिकता की भावना और आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का प्रतीक है। यही कारण है कि झारखंड में यह त्योहार पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
