कैंपस का पहला दिन: झिझक से आत्मविश्वास तक का सफर

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Published By Anjali Singh
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ज्ञानार्थी मीडिया कॉलेज में मेरा पहला दिन, पहला दिन नहीं था, बल्कि मेरे उस सपने की पहली सीढ़ी थी, जिसे मैंने बचपन से अपनी आंखों में सजाया था- एक पत्रकार बनने का सपना। जब मैं ज्ञानार्थी मीडिया कॉलेज के परिसर में पहुंची, तो मेरे कदम थोड़े डगमगा रहे थे और दिल की धड़कनें तेज थीं। मन में कई सवाल थे- क्या मैं इस नई दुनिया में खुद को ढाल पाऊंगी? क्या मुझे अच्छे दोस्त मिलेंगे? क्या मैं अपने सपनों के इस सफर में सफल हो पाऊंगी?

ओरिएंटेशन और शुरुआती सत्र के दौरान जब हमारे शिक्षकों ने हमसे संवाद किया, तो पत्रकारिता को लेकर मेरा नजरिया पूरी तरह बदल गया। उन्होंने समझाया कि पत्रकारिता केवल माइक थामने या कैमरे के सामने खड़े होने का नाम नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रति एक अटूट जिम्मेदारी है। सच को सामने लाना, लोगों की आवाज बनना और निष्पक्षता के साथ अपनी बात रखना ही एक सच्चे पत्रकार की पहचान होती है। उनकी बातें सुनकर मेरे भीतर एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार हुआ।

पहली क्लास खत्म होने के बाद, जो झिझक मेरे मन में थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी। कॉलेज की कैंटीन और गलियारों में मेरी मुलाकात अपने सहपाठियों से हुई। हम सब अलग-अलग जगहों से आए थे, लेकिन हम सबके बीच एक बात समान थी, वो थी दुनिया को बदलने का जज्बा और कुछ नया सीखने की चाह। बातचीत के दौरान हम अपने-अपने सपनों और उम्मीदों को साझा करने लगे। बातों-बातों में कब अजनबी सहपाठी दोस्त बन गए, पता ही नहीं चला। उस अपनत्व ने मेरे मन का डर काफी हद तक दूर कर दिया।

कॉलेज का माहौल, शिक्षकों का मार्गदर्शन और साथियों का सहयोग, इन सबने मेरे पहले दिन को यादगार बना दिया। हर कोना जैसे कुछ नया सिखाने को तैयार था और हर चेहरा एक नई कहानी कह रहा था। मुझे यह महसूस होने लगा कि मैंने अपने जीवन की सही दिशा चुन ली है। शाम को जब मैं कॉलेज से घर के लिए निकली, तो मेरे पास केवल किताबों का बोझ नहीं था, बल्कि एक नई सोच, आत्मविश्वास और बड़े इरादे भी थे। ज्ञानार्थी मीडिया कॉलेज के उस पहले दिन ने मुझे यह सिखाया कि पत्रकारिता का रास्ता चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन यह सम्मान, जिम्मेदारी और समाज सेवा से भरा हुआ है।--- पूनम मौर्य

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