पौराणिक कथा: कर्ण और वृषकेतु

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Published By Anjali Singh
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वेदव्यास लिखित महाभारत में कर्ण की कथा अत्यंत मार्मिक और रहस्यमयी रूप में वर्णित मिलती है। विवाह से पूर्व ऋ षि दुर्वासा के वरदान के प्रभाव से कुंती को एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसे समाज के भय से उन्होंने नदी में बहा दिया। यह बालक सूर्यपुत्र कर्ण था। नदी की धारा में बहते हुए उस शिशु को सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी ने अपनाकर उसका पालन-पोषण किया। आगे चलकर हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन ने कर्ण की प्रतिभा को पहचानते हुए उसे अपना मित्र बनाया और अंग देश का राजा बनाया। कर्ण के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि न तो वह स्वयं अपने जन्म का सत्य जान पाया और न ही पांडव और कौरव इस रहस्य से परिचित थे कि वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है। कर्ण की दो पत्नियां थीं-ऋ षाली और सुप्रिया।

ऋ षाली सूत कुल की थीं। उनसे कर्ण को नौ पुत्र प्राप्त हुए। महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण के आठ पुत्र- वृषसेन, चित्रसेन, सत्यसेन, सुसेन, शत्रुंजय, प्रसेन, बनसेन और अन्य अर्जुन, भीम तथा सात्यकि जैसे महारथियों के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए। केवल सबसे छोटा पुत्र वृषकेतु, जो उस समय अल्पायु था, भीष्म पितामह के आदेश से युद्ध में शामिल नहीं हुआ।

महाभारत युद्ध के उपरांत कर्ण का अंतिम संस्कार उसके वरदानानुसार श्रीकृष्ण के हाथों संपन्न हुआ। कर्ण की पत्नी ऋ षाली पति-वियोग सहन न कर सकीं और सती हो गईं। इधर वृषकेतु ने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया, परंतु सम्राट युधिष्ठिर ने सत्य स्वीकार करते हुए कर्ण को अपना बड़ा भाई घोषित किया और वृषकेतु को स्नेहपूर्वक इंद्रप्रस्थ का अधिपति बना दिया। वृषकेतु ने बाद में अर्जुन के साथ कई सैन्य अभियानों में भाग लिया।

कुंती द्वारा कर्ण जन्म का रहस्य छिपाए जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी माता को श्राप दिया कि भविष्य में कोई भी स्त्री रहस्य नहीं छिपा सकेगी। इसके पश्चात उन्होंने कुंती का त्याग कर दिया। कुंती, धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर और संजय वन को प्रस्थान कर गए। कहा जाता है कि कर्ण को न स्वीकार पाने का पश्चाताप कुंती को जीवनभर व्यथित करता रहा, ऐसे में वृषकेतु ने ही उनका सहारा बनकर सेवा की।

एक दिन जंगल में आग लग गई और आग बहुत तेजी से फैलने लगी। आंखों में पट्टी बांधे गांधारी और धृतराष्ट्र नहीं भाग सके। जंगल की आग में जलने लगे तो उनके साथ कुंती, विदुर और संजय ने साथ नहीं छोड़ा  और सभी के सभी जंगल की आग में जलकर मृत्यु को प्राप्त हुए। बाद में जब पांडव हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए, तब इंद्रप्रस्थ का शासन वृषकेतु और हस्तिनापुर का राज्य परीक्षित के हाथों में रहा। परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई, जिसके पश्चात उनके पुत्र जनमेजय ने नाग यज्ञ का आयोजन किया।