जॉब का पहला दिन: जब जिम्मेदारी ने गौरव का रूप लिया
मेरे जीवन की किताब में कुछ पन्ने ऐसे हैं, जिन्हें मैं जब भी पलटती हूं, तो उनकी चमक आज भी ताजा महसूस होती है। उन्हीं में से एक सबसे महत्वपूर्ण और यादगार पन्ना है 1 अगस्त 2011 का, जब पहली बार मैं बाराबंकी के मुंशी रघुनंदन प्रसाद सरदार पटेल महिला महाविद्यालय के प्राचार्या से मिली तो प्राचार्या ने कहा कि हमारे कॉलेज की बस प्रतिदिन लखनऊ से आती है, जिससे आपको यहां आने में कोई असुविधा नहीं होगी।
विश्वविद्यालय में मेरे बतौर प्रोफेसर चयन की कहानी बड़ी दिलचस्प है। मैं एक बार दूरदर्शन का एक प्रोग्राम कर रही थीं। उस प्रोग्राम को विश्वविद्यालय की प्राचार्या भी देखकर रहीं थीं। उनको मेरी गायकी बहुत पसंद आई और मेरी प्रतिभा से प्रभावित होकर मुझे मिलने के लिए बुलाया। प्राचार्य ने साक्षात्कार के बाद स्टाफ के सदस्य को बुलाकर उसे स्टॉफ रूम ले जाने को कहा। स्टॉफ रूम में सभी सदस्य साड़ी पहने थीं। क्योंकि इस कॉलेज में साड़ी कंपलसरी थी,मैं भी साड़ी में ही गई थी। जिसे देखकर मेरे मन में आत्मविश्वास बढ़ा। यह देखकर मुझे परिसर परिवार जैसा लगने लगा।
उस सुबह की हवा में एक हल्की सी ठंडक थी, जो मन में उमड़ते उत्साह और आशंकाओं के बीच एक सुकून दे रही थी। जब मैंने विश्वविद्यालय के विशाल और हरे-भरे परिसर में कदम रखा, तो एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ। वह शैक्षणिक वातावरण, विभागों की पुरानी, लेकिन भव्य इमारतें और छात्रों की चहल-पहल सब कुछ जैसे मुझे पुकार रहा था। मुझे अहसास हुआ कि आज से मेरी पहचान केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के निर्माता यानी एक ‘शिक्षक’ के रूप में होने वाली है।
विभाग पहुंचते ही विभागाध्यक्ष ने जिस गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया, उसने मेरी सारी हिचकिचाहट को पल भर में दूर कर दिया। सहकर्मियों का वह सहज और सहयोगी व्यवहार मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था, लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी। औपचारिकताओं के बीच मुझे बताया गया कि आज ही मेरी पहली कक्षा है। यह सुनकर मन में उत्साह तो था, पर साथ ही एक अनजानी घबराहट ने भी दस्तक दी।
जब मैं कक्षा के द्वार पर पहुंची, तो दर्जनों उत्सुक निगाहें मेरी ओर मुड़ गईं। वह मेरा पहला व्याख्यान था। मैंने अपनी आवाज को संयत किया और सहजता से
संवाद शुरू किया। शुरुआत में शब्दों में थोड़ी झिझक थी, लेकिन जैसे ही मैंने विषय की गहराई में उतरना शुरू किया, मेरा आत्मविश्वास लौट आया। मैंने कोशिश की कि मैं केवल ‘पढ़ाऊं’ नहीं, बल्कि ‘जुड़ूं’। जब छात्रों ने सवाल पूछना शुरू किया और कक्षा एक जीवंत चर्चा में तब्दील हो गई, तब मुझे लगा कि मैं अपनी बात उन तक पहुंचाने में सफल रही हूं।
कक्षा के बाद जब कुछ छात्र अपनी जिज्ञासाएं लेकर मेरे पास आए, तो मुझे एक बड़ी सच्चाई का अनुभव हुआ। एक शिक्षक केवल सूचनाओं का स्रोत नहीं होता, बल्कि वह एक मार्गदर्शक और प्रेरक भी होता है। उनकी आंखों की वह उम्मीद ही मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।
दोपहर में स्टाफ रूम में वरिष्ठ सहयोगियों के साथ बिताया गया समय भी बहुत कीमती रहा। उनके अनुभवों से निकले सुझावों ने मुझे सिखाया कि अध्यापन केवल ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है, यह निरंतर सीखने की एक प्रक्रिया है। दिन ढलने पर जब मैं परिसर से बाहर निकली, तो शरीर में थकान तो थी, लेकिन मन आत्मसंतुष्टि और गहरी खुशी से भरा था। वह दिन मेरे लिए केवल एक करियर की शुरुआत नहीं, बल्कि एक ऐसे संकल्प का आगाज था, जिसमें ज्ञान बांटने और समाज को एक नई दिशा देने का अवसर छुपा था। आज भी जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो वह दिन मुझे याद दिलाता है कि सपनों को जीने का साहस ही हमें जीवन के सबसे यादगार पल देता है।-डॉ. रचना श्रीवास्तव अवध विश्वविद्यालय अयोध्या
