अनोखी परंपरा, भिटौलीः पहाड़ की बेटियों तक पहुंचता मायके का स्नेह
उत्तराखंड की वादियों में जब चैत्र का महीना दस्तक देता है, तो सिर्फ मौसम ही नहीं बदलता, रिश्तों की मिठास भी एक बार फिर ताजा हो जाती है। उत्तराखंड की इसी मिट्टी से निकली एक परंपरा है भिटौली। एक ऐसा पर्व, जिसमें मायका अपनी विवाहित बेटी तक सिर्फ उपहार नहीं, बल्कि अपना स्नेह, अपनापन और यादें भेजता है। -रमेश जड़ौत, अल्मोड़ा
दरअसल, भिटौली कोई औपचारिक परंपरा नहीं, बल्कि भावनाओं का उत्सव है। वह हर साल चैत्र महीने में मनाया जाता है, जो पूरे 30 दिनों का होता है। इसी दौरान माता-पिता और भाई अपनी विवाहित बेटी या बहन के लिए वस्त्र, पकवान और उपहार लेकर उसके ससुराल जाते हैं। यह यात्रा सिर्फ दूरी तय करने की नहीं होती यह उस रिश्ते को फिर से जीने की कोशिश होती है, जो शादी के बाद दूरियों में बंध जाता है।
भिटौली की परंपरा की जड़ें उस समय में हैं जब संचार के साधन बेहद सीमित थे। पहाड़ों में बसी बेटियों के ससुराल कई कोस दूर हुआ करते थे। साल भर में मुलाकात भी मुश्किल होती थी। ऐसे में बुजुर्गों ने एक रास्ता निकाला भिटौली। एक ऐसा अवसर, जब परिवार अपनी विवाहित बेटी से मिलने उसके ससुराल जा सके, उसका हालचाल जान सके और उसे यह एहसास दिला सके कि मायका आज भी उतना ही करीब है।
भिटौली की खास पहचान ‘साई’
भिटौली की सबसे खास पहचान है साई। यह एक पारंपरिक पकवान है, जिसे चावल को पीसकर, भूनकर और उसमें मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है। जब यह साई और अन्य मिष्ठान विवाहित बेटी के हाथों में पहुंचते हैं, तो वह सिर्फ स्वाद नहीं होता वह मायके की यादों का स्वाद होता है। बेटी भी इस खुशी को अपने तक सीमित नहीं रखती। वह अपने ससुराल और आस-पड़ोस में यह कहकर मिठाई बांटती है भिटौली मायके से आई है। इसी एक वाक्य में दीया होता है उसका गर्व, उसका अपनापन।
इंटरनेट ने दूरी को किया खत्म
आज भले ही दिन में कई बार फोन पर हालचाल पूछ लिया जाता हो, वीडियो कॉल से चेहरे देख लिए जाते हों, लेकिन भिटौली की अहमियत कम नहीं हुई है क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ बातों से नहीं, मिलने से, साथ बैठने से और अपने हाथों से मिठास बांटने से मजबूत होते हैं।
भिटौली आज भी उसी सादगी और प्रेम के साथ मनाई जा रही है और शायद यही वजह है कि यह परंपरा आने वाले समय में भी यूं ही जीवित रहेगी। कुल मिलाकर भिटौली सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का तरीका है कि दूरी चाहे जितनी भी हो जाए मायका हमेशा दिल के सबसे करीब रहता हैं।
