बोध कथा: दीपक और हवा

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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एक गांव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत महत्वाकांक्षी था और जीवन में बड़ा नाम कमाना चाहता था, लेकिन हर बार जब वह कोई नया काम शुरू करता, तो थोड़ी सी कठिनाई आते ही हिम्मत हार बैठता। असफलताओं से परेशान होकर एक दिन वह गांव के एक वृद्ध गुरु के पास पहुंचा। अर्जुन ने कहा, “गुरुदेव, मैं मेहनत तो करता हूं, लेकिन बार-बार असफल हो जाता हूं। समझ नहीं आता कि मेरी मेहनत में कमी है या किस्मत साथ नहीं दे रही।”

गुरु ने कुछ देर सोचा और उसे रात को अपने साथ बैठने को कहा। जब अंधेरा हुआ, तो गुरु एक छोटा सा दीपक जलाकर अर्जुन के सामने रख दिया। फिर उन्होंने खिड़की खोल दी, जिससे तेज हवा अंदर आने लगी। हवा के झोंकों से दीपक की लौ बार-बार डगमगाने लगी और कुछ ही क्षणों में बुझ गई। गुरु ने फिर दीपक जलाया, इस बार खिड़की बंद कर दी। अब दीपक की लौ स्थिर और शांत जलने लगी।

गुरु मुस्कुराते हुए बोले, “अर्जुन, क्या तुमने कुछ समझा?” अर्जुन ने कहा, “जी गुरुदेव, जब हवा तेज थी तो दीपक बुझ गया और जब हवा बंद कर दी तो वह स्थिर जलने लगा।” गुरु ने समझाया, “यह दीपक तुम्हारी मेहनत है और हवा तुम्हारी कमजोरियां-जैसे अधैर्य, डर और जल्दी हार मान लेना। जब तक तुम इन कमजोरियों को अपने ऊपर हावी होने दोगे, तुम्हारी मेहनत का दीपक बार-बार बुझता रहेगा।” अर्जुन ध्यान से सुन रहा था। गुरु ने आगे कहा, “सफलता के लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि धैर्य और आत्मविश्वास भी जरूरी है। जब तुम अपने मन को स्थिर कर लोगे, तब कोई भी कठिनाई तुम्हें रोक नहीं पाएगी।”

अर्जुन को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने निश्चय किया कि अब वह हर कठिनाई का सामना धैर्य से करेगा और जल्दी हार नहीं मानेगा। कुछ समय बाद वही अर्जुन अपने काम में सफल होने लगा। अब वह हर परिस्थिति में शांत और दृढ़ बना रहता था। इस कथा से सीख मिलती है केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि धैर्य और आत्मविश्वास भी सफलता की कुंजी हैं।