नई कहानी के प्रमुख स्तंभ शेखर जोशी

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Published By Anjali Singh
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शेखर जोशी की गणना हिन्दी साहित्य के प्रमुख कहानीकारों में की जाती है। उन्होंने नई कहानी के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई। वे मर्मस्पर्शी कहानियों के प्रमुख कथाशिल्पी थे। उनकी कहानियों में आम आदमी का प्रतिबिंब झलकता है। शेखर जोशी का जन्म 10 सितंबर 1932 को अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर गांव में हुआ था। सोमेश्वर को पहाड़ी भाषा में ओलिया भी कहते थे। उनके पिता एक साधारण किसान थे। इसलिए उनका बचपन अभावों में बीता। शेखर जोशी की शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई थी। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही उनका चयन सुरक्षा विभाग में ई.एम.ई. अप्रेन्टिसशिप के लिए हो गया। 1996 तक वे एक सैनिक औद्योगिक प्रतिष्ठान में सेवारत रहे। इसके बाद उन्होंने स्वैच्छिक रूप से त्यागपत्र दे दिया और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में जुट गए।

उनकी रुचि कहानी लेखन में थी इसलिए उन्होंने कहानियां लिखना प्रारंभ कीं। आम आदमी को केन्द्र मानकर पारिवारिक एवं सामाजिक ताने-बाने पर बुनी उनकी कहानियां बहुत लोकप्रिय हुईं। उनकी कहानियों की प्रसिद्धि देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक जा पहुंची और उनकी गणना हिन्दी के अग्रिम पंक्ति के कहानीकारों में होने लगी। अपनी साहित्य यात्रा के दौरान उन्होंने ‘कोशी के घटवार’, ‘दाज्यू’, ‘बदबू’, ‘मेटल’, ‘पेड़ की याद’, नौरंगी बीमार है’ तथा प्रतिनिधि कहानियां जैसी अमर कृतियों की रचना की। उनको विशेष प्रसिद्धि ‘कोशी के घटवार’ से मिली। उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद अंग्रेजी, चेक, पोलिश एवं रूसी भाषाओं में भी हुआ। उनकी एक कहानी “दाज्यू“ पर बाल फिल्म भी बनी।

उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे। ‘अथ मूषक उवाच’, ‘हलवाला’, ‘साथ के लोग’, ‘मेरा पहाड़’, ‘चींटी के पर’ आदि शामिल हैं। मगर उन्हें विशेष प्रसिद्धि कहानीकार के रूप में मिली। शेखर की कहानियों में पहाड़ी जीवन, पहाड़ी संस्कृति एवं पहाड़ी परिवेश की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। उनका जन्म एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था इसलिए उनकी कहानियों में गरीबी, उत्पीड़न, नारी संघर्ष तथा पहाड़ी ग्रामीण समाज में फैली रुढ़ियों का सजीव चित्रण मिलता है। उन्होंने पहाड़ी जीवन के कठोर यथार्थ को अपनी कहानियों के माध्यम से समाज तक पहुंचाने का सफल प्रयास किया है। इसलिए उनकी कहानियां जीवंत प्रतीत होती हैं।

शेखर जोशी को उनकी कालजयी कहानियों के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। सन् 1987 में उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य सम्मान से समादृत किया गया। सन् 1995 में हिन्दी साहित्य का अति प्रतिष्ठित सम्मान साहित्य भूषण प्रदान किया गया। सन् 1997 में उन्हें ‘पहल’ सम्मान व ‘मैथिलीशरण गुप्त’ सम्मान से समादृत किया गया। अभी कुछ समय पूर्व उन्हें ‘श्री लाल शुक्ल सम्मान’ भी दिया गया। आज वे हमारे मध्य नहीं हैं, मगर अपनी कालजयी रचनाओं के रूप में वे सदैव अमर रहेंगे। उनकी कृतियां हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं।-सुरेश बाबू मिश्रा