यशोदा और कृष्ण : भारतीय कला की पुनर्पहचान
कला जगत की ताज़ा खबर यह है कि वैक्सीन उद्योग के अरबपति सायरस पूनावाला ने राजा रवि वर्मा की प्रसिद्ध कृति “यशोदा और कृष्ण” को 17.9 मिलियन डॉलर (लगभग 1672 करोड़ रुपये) में खरीदकर भारतीय चित्रकला की नीलामी का नया रिकॉर्ड स्थापित किया। यह नीलामी 1 अप्रैल को मुंबई स्थित सैफ्रौनआर्ट में हुई, जहां इस कृति ने अनुमानित मूल्य से कहीं अधिक बोली प्राप्त की और एम. एफ. हुसैन की कृति “ग्राम यात्रा” को मिली उच्चतम बोली का पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस तरह यह चित्र दक्षिण एशियाई कला के लिए दूसरी सबसे महँगी कृति बन गयी है, हालाँकि पहला स्थान 2017 में बिकी एक बौद्ध मूर्ति के पास है। पूनावाला ने इसे “राष्ट्रीय धरोहर” बताते हुए कहा कि वे इसे समय-समय पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपलब्ध कराते रहेंगे।
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यह कृति रवि वर्मा के करियर के उस शिखर काल की है, जिसमें पाश्चात्य यथार्थवादी शैली और भारतीय पौराणिक विषयों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उल्लेखनीय है कि रवि वर्मा उन कलाकारों में शामिल हैं जिन्हें 1972 के भारतीय कानून के तहत “राष्ट्रीय धरोहर” घोषित किया गया है, जिसके कारण उनकी कृतियाँ देश से बाहर नहीं जा सकतीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बिक्री भारतीय कला बाज़ार के परिपक्व होने और देश के भीतर सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति का सुखद संकेत है।-सुमन कुमार सिंह
“यशोदा और कृष्ण” शीर्षक वाली यह कृति केवल एक ग्रामीण दृश्य नहीं है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, भक्ति-परंपरा और मातृत्व के गहन प्रतीकवाद से समृद्ध एक दृश्य-आख्यान बन जाती है। राजा रवि वर्मा ने इस चित्र में पौराणिक कथा को लोकजीवन के सहज परिवेश में रूपायित कर उसे एक नई यथार्थवादी संवेदना प्रदान की है। चित्र में माता यशोदा को एक साधारण ग्रामीण स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो गाय का दूध निकाल रही हैं। उनके पीछे बालक कृष्ण का स्नेहपूर्ण आलिंगन मातृत्व और बाल-क्रीड़ा की आत्मीयता को व्यक्त करता है। यहाँ कृष्ण कोई अलौकिक, चमत्कारिक देवता नहीं, बल्कि एक चंचल, स्नेहमय बालक के रूप में दिखाई देते हैं-यही रवि वर्मा की सबसे बड़ी विशेषता है, अर्थात् देवत्व का मानवीकरण।
कला-इतिहास की दृष्टि से यह चित्र भारतीय भक्ति आंदोलन की उस परंपरा को दृश्य रूप देता है, जिसमें ईश्वर को एक सुलभ, प्रेमपूर्ण और मानवीय रूप में अनुभव किया जाता है। विदित है कि यशोदा-कृष्ण संबंध वैष्णव भक्ति परंपरा में ‘माधुर्य’ और ‘वात्सल्य’ भाव का प्रमुख उदाहरण है। इस चित्र में वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति अत्यंत स्वाभाविक और प्रभावशाली है-यशोदा का शांत, ममत्वपूर्ण चेहरा और कृष्ण का स्नेहिल स्पर्श इस भाव को मूर्त रूप देते हैं।
तकनीकी दृष्टि से, चित्र में प्रकाश और छाया का सूक्ष्म उपयोग, शरीर की आयतनात्मकता और वस्त्रों की यथार्थपरक बनावट यूरोपीय अकादमिक शैली की देन है, किंतु विषय-वस्तु, भाव और प्रतीक पूरी तरह भारतीय हैं। गौ यहां केवल एक पशु नहीं, बल्कि ‘गौ-माता’ के रूप में भारतीय सांस्कृतिक प्रतीक है- समृद्धि, पोषण और पवित्रता का संकेत।
राजा रवि वर्मा के चित्रों में एक और महत्वपूर्ण पहलू उभरता है-पौराणिक आख्यानों का लोक-रूपांतरण। कृष्ण, जो सामान्यतः वृंदावन के दिव्य नायक या अवतार के रूप में चित्रित होते हैं, यहाँ एक ग्रामीण बालक के रूप में उपस्थित हैं। इससे दर्शक के साथ उनका संबंध अधिक आत्मीय और निकट हो जाता है। इस प्रकार, रवि वर्मा ने धार्मिक कथा को सामाजिक यथार्थ के साथ जोड़कर उसे जनसामान्य के अनुभव का हिस्सा बना दिया। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह चित्र उस सांस्कृतिक परियोजना का हिस्सा है, जिसमें औपनिवेशिक काल में भारतीय पहचान को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया जा रहा था। यशोदा और कृष्ण के माध्यम से ‘भारतीय मातृत्व’ और ‘आदर्श बालक’ की छवि गढ़ी गई, जो एक सांस्कृतिक आदर्श का निर्माण करती है।
अंततः “यशोदा और कृष्ण” केवल एक चित्र नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, भक्ति-संवेदना और सांस्कृतिक प्रतीकों का समन्वित रूप है। राजा रवि वर्मा ने इस पेंटिंग के माध्यम से यह सिद्ध किया कि पौराणिक कथाएँ केवल अलौकिक नहीं, बल्कि मानवीय अनुभवों के माध्यम से भी उतनी ही प्रभावशाली ढंग से व्यक्त की जा सकती हैं। यही कारण है कि यह कृति आज भी सौंदर्य, भाव और अर्थ- तीनों स्तरों पर अत्यंत प्रासंगिक बनी हुई है।
