दिल्ली में अयोध्या उतर आई! तीन दिनों तक गूंजी श्रीरामचरितमानस की ध्वनियां, अयोध्या पर्व 2026 ने रचा सांस्कृतिक महायज्ञ
तीन अप्रैल की सुबह नई दिल्ली के जनपथ स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रांगण में श्रीरामचरित मानस की पावन ध्वनियां गूंजने के साथ लगा मानो दिल्ली की धरती पर अयोध्या उतर आई हो। यह केवल किसी कार्यक्रम का उद्घाटन नहीं था, यह उस चिरंतन भाव की पुनर्प्रतिष्ठा लगती थी, जो युगों-युगों से इस देश की आत्मा में जीवंत रहा है। राजधानी की महानगरीय व्यस्तताओं के बीच यह परिसर तीन दिनों के लिए एक जीवंत सांस्कृतिक तीर्थ में रूपांतरित हो गया, जिसने अयोध्या, उत्तर प्रदेश से गुजरात, महाराष्ट्र से असम और मध्य प्रदेश से दिल्ली तक को समाहित कर लिया। इस सांस्कृतिक महायज्ञ से संदेश गूंजने लगे।
-प्रस्तुति-राजेंद्र कुमार पांडेय व विमल कुमार सिंह
श्री अयोध्या न्यास के मुख्य आयोजन में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र एवं प्रज्ञा के सह-आयोजकत्व में इस ऐतिहासिक परिसर में तीन दिनों तक जो घटित हुआ, वह किसी एक कार्यक्रम की परिभाषा में नहीं समाता। यह एक महायज्ञ था, जिसमें विचार की आहुति, कला की ऊर्जा, साहित्य का सौंदर्य उसके केंद्र मं् था। अयोध्या का वह अदृश्य तेज जो समूचे भारत को एक सूत्र में पिरोता है। इस पर्व ने वह प्रश्न भी उठाया और उसका उत्तर भी खोजा क्या आधुनिकता की तीव्र गति में अयोध्या अपनी आत्मा को सुरक्षित रख पाएगी? अयोध्या पर्व 2026 न तो किसी एक वर्ग का उत्सव था, न किसी एक विचारधारा का मंच। विद्वान, कलाकार, साधु-संत, प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार, युवा, विद्यार्थी, गृहिणियां समाज के प्रत्येक वर्ग की सक्रिय भागीदारी ने इसे वास्तविक अर्थों में जनपर्व बनाया और इस सबके केंद्र में था, एक विश्वास कि राम केवल किसी एक वर्ग के नहीं हैं, राम सबके हैं।
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उद्घाटन : गरिमा और भाव का संगम
तीन अप्रैल की अपराह्न ‘अयोध्या पर्व’ का आधिकारिक उद्घाटन हुआ। उपस्थित विभूतियों की सूची ही इस आयोजन की ऊंचाई का प्रमाण थी। अयोध्या के श्री मणिरामदास छावनी के पूज्य महंत कमल नयन दास जी महाराज की उपस्थिति ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश भैय्याजी जोशी ने अपने उद्बोधन में अयोध्या को केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का केन्द्र-बिन्दु बताया। राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने कहा कि अयोध्या के प्रति हम सबका दायित्व केवल श्रद्धा तक सीमित नहीं है, उसका विकास हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है। उन्होंने अगला अयोध्या पर्व जयपुर में आयोजित करने का न्यौता भी दिया। देश के उत्तराखंड राज्य और मॉरीशस देश में अयोध्या पर्व के आयोजन का न्यौता पहले से मिल चुका है। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अयोध्या को समूचे भारतवर्ष की एकता का प्रतीक निरूपित किया। राज्यसभा सांसद अशोक बाजपेई के काव्यात्मक उद्गारों ने समारोह को एक विशेष रंग दिया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष पदम विभूषण राम बहादुर राय ने इस आयोजन को भारत की सांस्कृतिक पुनर्जागरण यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। इन सबके पहले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने संस्थान की ओर से स्वागत उद्बोधन दिया गया। उद्घाटन से पूर्व प्रातः ‘भविष्य की अयोध्या, नगर योजना’ विषय पर पहला वैचारिक सत्र आयोजित हुआ। इस सत्र में यमुना अथॉरिटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी राकेश सिंह, गौड़ संस इंडिया के संस्थापक बीएल गौड़ और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शैलेश शुक्ला ने अयोध्या के भावी नगर नियोजन पर विस्तृत विचार रखे। एक भव्य तीर्थनगरी के रूप में अयोध्या को किस प्रकार विकसित किया जाए कि वह अपनी प्राचीन आत्मा को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति कर सके, इस प्रश्न ने श्रोताओं को गहरे मंथन में उतार दिया।
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आयोजन का केंद्रीय विचार : परंपरा और प्रगति का द्वंद्व
अयोध्या पर्व 2026 का केन्द्रीय विचार अत्यंत महत्वपूर्ण था ‘अयोध्या का विकास हो, पर उसका वैशिष्ट्य न खो जाए।’ यह प्रश्न आज के भारत के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अयोध्या के लिए। नए मंदिर के निर्माण के साथ-साथ जिस गति से अयोध्या का आधारभूत ढांचा बदल रहा है, उससे एक सूक्ष्म चिंता जन्म लेती है कि कहीं आधुनिकता की इस आपाधापी में उस पुरातन नगरी की आध्यात्मिक सुगंध और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य ओझल तो नहीं हो जाएगा? यही चिंता इस पर्व के प्रत्येक सत्र में, प्रत्येक वक्ता के शब्दों में अलग-अलग अभिव्यक्ति के साथ प्रकट हुई, लेकिन इस चिंता के साथ-साथ एक अटूट विश्वास भी था। जिस धरती पर स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम ने जन्म लिया हो, उस मिट्टी में एक ऐसी शक्ति है, जो विकृति को स्वयं ही दूर करती रही है। यह विश्वास कोरी भावना नहीं था, यह उस इतिहास से उपजा था, जिसमें अयोध्या ने बाबर से लेकर आधुनिक शहरीकरण तक की चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी आत्मा को सुरक्षित रखा है। ‘अयोध्या पर्व 2026’ इसी विश्वास की सार्वजनिक घोषणा भी था। तीन दिनों में कुल छह वैचारिक सत्रों का आयोजन हुआ, जिनमें नगर योजना से लेकर सामाजिक समरसता तक, रामराज्य की अवधारणा से लेकर शासन और समाज के पारस्परिक दायित्वों तक, अयोध्या के भौतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष के प्रत्येक आयाम पर गहन मंथन हुआ।
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साहित्य का सृजन पुस्तकों का लोकार्पण
तीन दिनों के दौरान प्रभात प्रकाशन की पांच महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। ‘अहो अयोध्या’, ‘मिली राम मोदियाई’, ‘संतों में ध्रुव तारे’, ‘आकाश पुष्प’ और ‘चौरासी कोस की अयोध्या’- ये पांचों कृतियां इस पर्व की बौद्धिक और साहित्यिक संपदा के रूप में सामने आईं। प्रत्येक पुस्तक अयोध्या और रामतत्व के किसी न किसी पक्ष को उजागर करती है। ‘चौरासी कोस की अयोध्या’ उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अयोध्या की भूगोल, उसके तीर्थों और उसकी सांस्कृतिक परिधि को समग्रता में समझना चाहते हैं। ‘अहो अयोध्या’ अयोध्या के प्रति उस विस्मय-भाव को भाषा देती है, जो हर भारतीय के मन में इस नगरी को लेकर स्वाभाविक रूप से उपस्थित रहता है। इसी दौरान अयोध्या पर्व 2026 की स्मारिका का भी लोकार्पण हुआ, जो अपने आप में एक संग्रहणीय प्रकाशन है।
अयोध्या पर्व के मंच से पुस्तकों का लोकार्पण केवल एक औपचारिकता नहीं थी। यह उस विश्वास की सार्वजनिक घोषणा थी कि विचार और ज्ञान की यात्रा किसी एक आयोजन के साथ समाप्त नहीं होती। ये पुस्तकें उन हाथों तक पहुंचेंगी जो इन्हें पढ़ेंगे और फिर अयोध्या के बारे में एक नई, गहरी और अधिक समृद्ध दृष्टि के साथ सोचेंगे।
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सीता रसोई और अवध का स्वाद : संस्कृति का स्पर्शनीय अनुभव
किसी भी संस्कृति को समझने का एक अत्यंत सहज और प्रत्यक्ष मार्ग है-उसके भोजन का स्वाद लेना। ‘अयोध्या पर्व 2026’ के आयोजकों ने यह बात भलीभांति समझी थी। ‘सीता रसोई’ के नाम से आयोजित अवधी भोजन उत्सव में फरा, विशेष चाट और पारंपरिक मिठाइयों ने आगंतुकों को अवध की सोंधी माटी के स्वाद से जोड़ दिया। यह अनुभव केवल रसनातृप्ति का नहीं था, यह एक सभ्यता के भोजन-संस्कार का साक्षात्कार था। अवध क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी और बिक्री ने इस पर्व को एक लघु अयोध्या का स्वरूप दे दिया था। राम प्रसाद, पूजा सामग्री, कलाचित्र और कुटीर उद्योगों के उत्पाद, ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते थे, जिसमें दिल्ली की व्यस्त दिनचर्या से थकी आत्माएं क्षणभर के लिए अयोध्या में पहुंच जाती थीं। यह श्रद्धा और स्वावलंबन का एक साथ उत्सव था।
तीनों दिन परिसर में अखंड रामायण पाठ की ध्वनि निरंतर गूंजती रही। यह इस पर्व का आध्यात्मिक हृदय था, जहां शब्द, स्वर और श्रद्धा एकाकार हो गए थे। वैचारिक मंथन, कलात्मक अभिव्यक्ति और लौकिक आनंद के समानांतर यह आध्यात्मिक धारा अनवरत प्रवाहित रही और इसी ने इस आयोजन को एक सच्चे यज्ञ का स्वरूप प्रदान किया
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शासन, समाज और समापन का महायज्ञ
पांच अप्रैल के प्रातः कालीन सत्र का विषय था- ‘भविष्य की अयोध्या: शासन और समाज।’ आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण, आचार्य ज्ञानेश गौड़ और डॉ. चंद्रशेखर प्राण ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अयोध्या के भविष्य का निर्माण केवल सरकार और उद्योग जगत का दायित्व नहीं है। समाज की सक्रिय और जागरूक भागीदारी के बिना यह कार्य अधूरा ही रहेगा। इस अवसर पर अयोध्या के प्रतिनिधि के रूप में आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने अपने सारगर्भित और ओजस्वी वक्तव्य में सरकारी मशीनरी और उसकी कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए।
समापन समारोह इस पर्व का सबसे भावपूर्ण क्षण था। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने राम मंदिर के निर्माण की यात्रा और अयोध्या के भविष्य पर ऐसा उद्बोधन दिया, जिसने श्रोताओं की आंखें नम कर दीं। कहा कि यह मंदिर केवल पत्थरों की इमारत नहीं है, यह करोड़ों भारतवासियों के संघर्ष, साधना और बलिदान का मूर्त स्वरूप है। सांस्कृतिक राजदूत के रूप में अयोध्या के पूर्व सांसद लल्लू सिंह और वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र पांडेय के वक्तव्यों ने इस महायज्ञ को और अधिक अर्थपूर्ण बनाया। राम बहादुर राय के अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ इस महायज्ञ की पूर्णाहुति हुई।
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समानांतर सत्रों की शृंखला
तीन दिनों में छह मुख्य सत्रों के अतिरिक्त तीन समानांतर सत्र भी आयोजित हुए। भारतीय भाषा आंदोलन के समर्पित अधिवक्ताओं ने अपने सत्र में यह संकल्प दोहराया कि न्यायालयों में भारतीय भाषाओं की स्थापना का संघर्ष एक व्यापक जनांदोलन का रूप लेगा, जिसके तट पर पितरों के तर्पण और भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त कराने वाली निरंजना-फल्गू रीवर रीचार्ज मिशन के संयोजक संजय सज्जन सिंह के नेतृत्व में हुए सत्र ने पर्यावरण चेतना और नदी संस्कृति के पुनरुद्धार का मार्ग प्रशस्त किया। काव्य गोष्ठी में प्रख्यात कवि बालस्वरूप राही सहित 21 कवियों ने राम के आदर्शों को समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत किया।
‘अयोध्या पर्व 2026’ ने यह सिद्ध किया कि राम केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पुरुष नहीं हैं, वे भारतीय चेतना का वह केन्द्र-बिन्दु हैं, जिसके इर्द-गिर्द इस देश का सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन आज भी परिक्रमा करता है। जब शबरी की भक्ति और रामकिंकर के दर्शन एक मंच पर जीवित होते हैं, तो अयोध्या केवल एक नगर नहीं रहती-वह एक जीवंत सभ्यता बन जाती है।
सांस्कृतिक संध्याएं: सुरों और भावों में बसे राघव
वैचारिक सत्रों के साथ-साथ तीनों सायंकाल को कला के ऐसे अनुष्ठान हुए, जिन्होंने इस पर्व को एक संपूर्ण उत्सव बना दिया। तीन अप्रैल की संध्या को पंडित डॉ. अभय मानके ने ‘गीत रामायण’ प्रस्तुत की। मूलतः गोविंद दामोदर माडगुलकर से रचित और सुधीर फड़के से संगीतबद्ध इस विश्वविख्यात मराठी रचना का हिंदी रूपांतर जब मानके जी के स्वरों में गूंजा, तो लगा मानो भाषाओं की सीमाएं मिट गईं और केवल राम का भाव शेष रह गया। चार अप्रैल को माधवी मधुकर के भावपूर्ण गायन ने वातावरण को राममय कर दिया। संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी भजनों की उनकी प्रस्तुति ने माहौल को दैवीय आभा से भर दिया। इसके बाग ‘शबरी के राम’ नाटक का मंचन हुआ, जिसे प्रेरणा अग्रवाल ने लिखा और नवीन अग्रवाल ने निर्देशित किया। नाटक में शबरी की प्रतीक्षा, उनका प्रेम और राम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने दर्शकों को इतनी गहराई से स्पर्श किया कि अनेक आंखें सजल हो उठीं। पांच अप्रैल की संध्या शुभम, अनुज और मनीष के बांसुरी वादन से आरंभ हुई। उसके बाद सत्रिया केन्द्र गुवाहाटी की नाट्य प्रस्तुति ‘श्री राम बिजय’ ने पूर्वोत्तर भारत की भक्ति परंपरा के वैभव को दिल्ली के श्रोताओं के समक्ष जीवंत कर दिया। इसे संगीत नाटक अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के सौजन्य से प्रस्तुत किया गया था।
प्रदर्शनियां: दृश्यात्मक स्मृतियों का संसार
परिसर में दो विशिष्ट प्रदर्शनियां दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहीं। चित्रांजलि सोसाइटी जबलपुर से आयोजित प्रदर्शनी में 250 से अधिक चित्रों के माध्यम से अयोध्या की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक क्षणों और भारतीय पर्वों की झलक प्रस्तुत की गई। यह केवल चित्रों का संग्रह नहीं था, यह भारतीय संस्कृति और उसकी उत्सवधर्मिता का एक दृश्यात्मक आख्यान था, जिसे देखते-देखते दर्शकों के मन में अयोध्या का वह अलौकिक क्षण जीवंत हो उठता था, जब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी।
दूसरी प्रदर्शनी पंडित रामकिंकर उपाध्याय के जीवन और साधना को समर्पित थी। यह प्रदर्शनी उन दर्शकों के लिए तो विशेष रूप से बहुमूल्य थी, जो रामकिंकर जी के विचारों से परिचित नहीं थे। उनकी जीवन यात्रा के चित्र, उनके अनमोल पत्र और उनकी डायरी के पन्ने-इन सबको एक साथ प्रस्तुत करने का यह प्रयास किसी एक विद्वान की जीवनी से आगे बढ़कर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक पुरातन धारा का स्मरण था।
सेवा और समर्पण
इस विशाल आयोजन के पीछे जो अदृश्य ताना-बाना था, वह भी अपने आप में उल्लेखनीय है। श्री अयोध्या न्यास और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के इस साझा प्रयास को दिल्ली विश्वविद्यालय के सैकड़ों स्वयंसेवकों ने अपनी निःस्वार्थ सेवा से सींचा। यह पर्व सबका था और इसमें जो भी आया, उसके तीन समय के भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की गई। यह सेवाभाव केवल आयोजन की सुविधाओं तक सीमित नहीं था। कार्यक्रमों की परिकल्पना में, वक्ताओं के चयन में, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की रूपरेखा में- हर स्तर पर एक सूक्ष्म संवेदनशीलता दिखाई दी। यह प्रयास था कि प्रत्येक दर्शक, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से आया हो, इस पर्व में अपनेपन का अनुभव करे। यह प्रयास सफल रहा। मजदूर से लेकर उद्योगपति, बालक से लेकर वृद्ध, कलाकार से लेकर प्रशासनिक अधिकारी-समाज का प्रत्येक वर्ग इस पर्व में सम्मिलित हुआ। यह समावेशिता ही ‘अयोध्या पर्व 2026’की सबसे बड़ी विशेषता और सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
उपसंहार : एक दीप जो जलता रहेगा
पांच अप्रैल की सायंकाल जब सत्रिया नृत्य की अंतिम प्रस्तुति के साथ ‘अयोध्या पर्व 2026’ का पट बंद हुआ, तो परिसर में एक अद्भुत मौन छा गया। यह खालीपन का मौन नहीं था, यह तृप्ति का, पूर्णता का मौन था। तीन दिनों तक दिल्ली के इस परिसर में जो ऊर्जा थी, जो भाव था, जो विचार था- वह किसी नियमित आयोजन की स्मृति नहीं बनेगा। वह प्रत्येक हृदय में एक बीज की तरह रोपित हो गया है।
परिसर में अखंड रामायण के पाठ की वह ध्वनि जो तीन दिनों तक अनवरत गूंजती रही, वह इस पर्व के समापन के साथ भले ही थम गई हो, लेकिन जिन हृदयों ने उसे सुना, उनमें वह सदा के लिए अंकित हो गई। ‘अयोध्या पर्व 2026’ इस बात का प्रमाण है कि अयोध्या केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है, जो राजधानी के मध्य में भी अपना तीर्थ स्थापित कर सकती है।
यह पर्व एक प्रश्न छोड़ जाता है और एक प्रेरणा भी, क्या हम आधुनिकता की दौड़ में अयोध्या की आत्मा को बचाए रख पाएंगे? शायद इसका उत्तर इसी आयोजन ने दे दिया कि जब तक भारत का मन ऐसे पर्वों के माध्यम से अयोध्या से जुड़ता रहेगा, यह नगरी अपना वैशिष्ट्य कभी नहीं खोएगी।
