काव्य : तो हुए तरल...
फिर आंखों में सपने सारे
हुए सजल,
पल भर में ही रिश्ते सारे, गए बदल।
नजरें नजरों से, कतराकर दूर हुईं, शंकाएं चेहरों पर, घिर मगरुर हुईं,
अवसादों में डूबे मन, तो हुए तरल।
बातों बातों में मन का सच,
निकल गया।
बहुत तेज चढ़ने में ही तो,
फिसल गया।
संवादों से गई मनों की
बर्फ पिघल, जीवन जीना भी अजीब सा लगता है।
हर कोई अब मानों खुद को,
छलता है।
सोच रहा था कैसा होगा
जानें कल?
पंकज मिश्र ‘ अटल’
