वेलनेस : बदलती जीवनशैली और बढ़ती आंतों की बीमारियां

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Published By Deepak Mishra
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आज की तेज रफ्तार जीवनशैली, अनियमित खानपान, मानसिक तनाव और शारीरिक निष्क्रियता के कारण पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में एक गंभीर और जटिल रोग है अल्सरेटिव कोलाइटिस, जिसे आयुर्वेद में ग्रहणी के एक प्रकार के रूप में समझा जाता है। यह बड़ी आंत की दीर्घकालिक सूजन संबंधी बीमारी है, जो धीरे-धीरे विकसित होकर रोगी के दैनिक जीवन, शारीरिक शक्ति और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। प्रारंभ में सामान्य दस्त या पेट दर्द जैसा दिखने वाला यह रोग समय के साथ खून वाले दस्त, कमजोरी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट का कारण बन जाता है।

डॉ. मानसी बी.ए.एम.एस., एम. एस.(जनरल सर्जरी) कंसल्टेंट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर शल्यतंत्र विभाग, रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, बरेली

क्या है अल्सरेटिव कोलाइटिस
अल्सरेटिव कोलाइटिस एक प्रकार की इंफ्लेमेटरी बावेल डिजीज (IBD) है, जिसमें बड़ी आंत और रेक्टम की भीतरी परत में सूजन तथा घाव (अल्सर) बन जाते हैं। इस कारण रोगी को बार-बार दस्त, मल में खून और म्यूकस आना, पेट में दर्द और ऐंठन, मल त्याग के बाद भी अधूरापन महसूस होना, भूख में कमी, वजन घटना, कमजोरी और थकान जैसी समस्याए¦ं होती हैं। यदि समय पर इसका उचित उपचार न किया जाए, तो यह रोग लंबे समय तक बना रह सकता है और कई जटिलताओं को जन्म दे सकता है।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इस रोग के नियंत्रण के लिए एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाइयां, स्टेरॉयड्स तथा इम्यूनोसप्रेसेंट्स का उपयोग किया जाता है। ये दवाएं लक्षणों को कुछ समय तक नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन लंबे समय तक इनके सेवन से दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कई बार दवा बंद करते ही रोग दोबारा उभर आता है, जिससे रोगी जीवनभर दवाओं पर निर्भर हो सकता है। यही कारण है कि बहुत से लोग स्थायी और समग्र समाधान के लिए आयुर्वेद की ओर रुख कर रहे हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: रोग की जड़ तक उपचार

आयुर्वेद में अल्सरेटिव कोलाइटिस को मुख्यतः पित्त-रक्तज अथवा पित्तज ग्रहणी विकार के अंतर्गत देखा जाता है। इस रोग का संबंध पित्त दोष के असंतुलन, रक्त धातु की दूषित अवस्था, अग्नि यानी पाचन शक्ति की कमजोरी तथा मानसिक तनाव से माना जाता है। जब पित्त दोष बढ़ जाता है, तो आंतों की श्लेष्मा परत में जलन, सूजन और घाव बनने लगते हैं, जिससे रक्तस्राव होने लगता है। आयुर्वेद केवल लक्षणों को दबाने का प्रयास नहीं करता, बल्कि दोष संतुलन, अग्नि सुधार, धातु पोषण और क्षतिग्रस्त आंतों की मरम्मत के माध्यम से रोग के जड़ तक उपचार करता है।

तैल तक्र बस्ती: आयुर्वेदिक उपचार का प्रभावी आधार
अल्सरेटिव कोलाइटिस के आयुर्वेदिक उपचार में तैल तक्र बस्ती एक अत्यंत प्रभावशाली पंचकर्म चिकित्सा है। इस प्रक्रिया में औषधीय छाछ (तक्र) और विशेष औषधीय तेल को मिलाकर बस्ती अर्थात एनिमा के रूप में बड़ी आंत में पहुंचाया जाता है। यह द्रव्य सीधे कोलन तक पहुंचकर सूजन वाली परत पर कार्य करता है, आंतों की भीतरी श्लेष्मा परत की मरम्मत को बढ़ावा देता है तथा वात और पित्त दोनों दोषों को संतुलित करता है। इससे सूजन कम होती है, रक्तस्राव नियंत्रित होता है, मल त्याग सामान्य होता है और आंतों को पोषण मिलता है। यह केवल लक्षणों को शांत नहीं करता, बल्कि वास्तविक हीलिंग और पुनर्स्थापन का कार्य करता है।

केस स्टडी: उपचार से मिला नया जीवन
एक 35 वर्षीय महिला रोगी, जो पिछले पांच वर्षों से अल्सरेटिव कोलाइटिस से पीड़ित थीं, उपचार हेतु संस्थान में आईं। उन्हें दिन में 6-8 बार खून वाले दस्त, लगातार पेट दर्द, अत्यधिक कमजोरी, वजन में कमी, मानसिक तनाव और चिंता की समस्या थी। पहले कई उपचार लेने के बावजूद उन्हें स्थायी राहत नहीं मिली। रोगी की प्रकृति, दोष स्थिति और रोग की अवस्था का मूल्यांकन करके तैल तक्र बस्ती, पाचन सुधारक औषधियां, सूजनरोधी हर्बल दवाएं तथा सख्त आहार-विहार निर्देश दिए गए। परिणामस्वरूप 15 दिनों में दस्त और रक्तस्राव में स्पष्ट कमी आई, एक महीने में 90-95 प्रतिशत सुधार हुआ और तीन महीने में रोग लगभग पूर्ण नियंत्रण में आ गया। फॉलोअप में पुनरावृत्ति भी नहीं हुई।

सहायक औषधियां और घरेलू उपाय
तैल तक्र बस्ती के साथ कुछ आयुर्वेदिक औषधियां उपचार को और अधिक प्रभावी बनाती हैं। इसबगोल को ताजी छाछ के साथ लेने से आंतों की सुरक्षा होती है और मल स्थिर रहता है। कच्चा बेल दस्त और सूजन में लाभकारी है। गिलोय तथा शतावरी पित्त संतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हैं। मुलेठी और नारियल पानी शीतलता प्रदान करते हैं तथा आंतों की क्षति भरने में मदद करते हैं। नागकेसर रक्तस्राव रोकने में उपयोगी माना जाता है।

आहार और जीवनशैली की भूमिका
इस रोग में केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि जीवनशैली में सुधार न किया जाए, तो रोग दोबारा उभर सकता है। रोगी को हल्का और सुपाच्य भोजन जैसे मूंग दाल, खिचड़ी और छाछ लेना चाहिए। पर्याप्त नींद, नियमित दिनचर्या, योग, ध्यान और प्राणायाम मानसिक तनाव कम करने में मदद करते हैं। दूसरी ओर मसालेदार, तला, खट्टा भोजन, चाय, कॉफी, फास्ट फूड, देर रात जागना और अनियमित भोजन से बचना चाहिए। कई रोगियों को दूध एवं कुछ डेयरी उत्पादों से भी परहेज करना लाभकारी रहता है।

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रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि जनजागरूकता बढ़ाने में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। स्वास्थ्य शिविरों, परामर्श कार्यक्रमों, लेखों तथा जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को पाचन स्वास्थ्य, संतुलित आहार, तनाव प्रबंधन और आयुर्वेदिक जीवनशैली के महत्व के बारे में शिक्षित किया जाता है।इसके अतिरिक्त संस्थान शोध एवं क्लीनिकल अनुभवों के माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास कर रहा है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति दीर्घकालिक रोगों में प्रभावी, सुरक्षित और जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली हो सकती है। इस प्रकार रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल रोगियों को न केवल उपचार प्रदान कर रहा है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की दिशा में मार्गदर्शन देकर समाज के स्वास्थ्य संवर्धन में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

आयुर्वेद क्यों देता है दीर्घकालिक राहत
आयुर्वेद का दृष्टिकोण समग्र है। यह केवल रोग के लक्षणों को नहीं देखता, बल्कि पूरे शरीर, पाचन शक्ति, मानसिक स्थिति और जीवनशैली को संतुलित करने का प्रयास करता है। जब सूजन जड़ से नियंत्रित होती है, आंतों की परत पुनः स्वस्थ होती है और पाचन शक्ति मजबूत होती है, तब रोग की पुनरावृत्ति की संभावना कम हो जाती है। यही कारण है कि आयुर्वेद कई रोगियों को दीर्घकालिक राहत देने में सक्षम सिद्ध होता है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस केवल पाचन तंत्र का रोग नहीं, बल्कि शरीर, मन और जीवनशैली से जुड़ा एक जटिल विकार है। तैल तक्र बस्ती इस रोग के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह सीधे रोग स्थान पर कार्य करती है, सूजन और रक्तस्राव को नियंत्रित करती है, आंतों को पुनर्जीवित करती है और लंबे समय तक राहत प्रदान करती है। सही समय पर निदान, विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श, संतुलित आहार, अनुशासित जीवनशैली और उचित आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से इस रोग को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे रोगी स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकता है।

रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल अल्सरेटिव कोलाइटिस (रक्तातिसार) जैसे जटिल पाचन तंत्र संबंधी रोगों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संस्थान में आयुर्वेद के सिद्धांतों पर आधारित समग्र चिकित्सा पद्धति अपनाई जाती है, जिसमें रोग के केवल लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल कारणों तक पहुंचकर उपचार किया जाता है। अनुभवी विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा रोगी की प्रकृति, दोष स्थिति, पाचन शक्ति तथा रोग की गंभीरता का विस्तृत मूल्यांकन कर व्यक्तिगत उपचार योजना बनाई जाती है।

संस्थान में पंचकर्म चिकित्सा, विशेष रूप से तैल तक्र बस्ती जैसी उन्नत आयुर्वेदिक प्रक्रियाओं का सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से संचालन किया जाता है, जिससे अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे रोगों में प्रभावी परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही पाचन सुधारक औषधियां, सूजनरोधी हर्बल उपचार, आहार परामर्श तथा जीवनशैली प्रबंधन भी रोगी की आवश्यकतानुसार दिया जाता है। 

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