लोकायन : रूप बदलने वाले बहुरूपिए

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Published By Deepak Mishra
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शिवचरण चौहान, कानपुर/ एक बार बादशाह अकबर के दरबार में एक बहरूपिया आया। उसने दरबार में चुनौती दी कि वह ऐसा भेष बदल सकता है कि उसे कोई पहचान नहीं सकता। अगर कोई उसके भेष में कमी निकाल दे तो वह उसे अपना गुरु बना लेगा। शर्त मान ली गई। एक दिन बादशाह के दरबार में एक बैल घुस आया। सभी दरबारी इधर-उधर भागने लगे। बैल, बादशाह के सिंहासन के पास आकर पंगुराने लगा। तभी बीरबल ने एक कंकड़ बैल की पीठ पर मारा। बैल ने पीठ हिलाई। बस बीरबल बोल पड़ा-“शहंशाह, यह बैल नहीं बहरूपिया है।”

बैल चोट लगने से उधर की खाल हिलाता है, जिधर उसे चोट लगती है, किंतु बहरूपिए ने धोखे से दूसरी तरफ की खाल हिला दी। एक छोटी-सी गलती से वह पकड़ा गया।  एक समय था जब रूप बदलना एक महत्वपूर्ण कला थी। बहरूपियों का समाज में सम्मान था। वे राजदरबारों में आदर पाते, इनाम-इकराम हासिल करते थे। जयपुर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश के बहरूपिए विख्यात थे। आज बहरूपियों के परिवार संकट में हैं।

बहरूपियों की कला को सम्मान देने वाला कोई नहीं बचा। बहरूपियों का इतिहास बहुत प्राचीन है। बहरूपिए राजा, फकीर, साधु, देवी-देवता, डाकू, पागल, विद्वान, राजसैनिक, सिपाही, हरकारा, वैद्य, हकीम, गूजरी, महिला, बैल, बंदर आदि का रूप धारण कर लोगों का मनोरंजन करते थे। आज भी कुछ शहरों में बहरूपियों को कभी-कभार हाट-बाजारों में घूमते देखा जा सकता है। रूप बदलने के लिए बहुरूपिया मिट्टी, सिंदूर, बाल आदि से लेकर आधुनिक साधनों का प्रयोग करते हैं।

होली, दीवाली के त्योहार पर आज भी बहरूपियों को गली, मुहल्लों और बाजारों में घूमते हुए देखा जा सकता है। जैन साहित्य में बहरूपिए की एक कथा प्रसिद्ध है। पाटन-गुजरात के महाराजा कुमार पाल का महामंत्री उदयन एक युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गया। उदयन ने अपने बेटों से कहा- “मेरा अंत समय आ गया है। यदि मैं पंचमहाव्रतधारी महामुनि के दर्शन कर लूं, तो मुझे मोक्ष प्राप्त हो जाए।” युद्ध भूमि में किसी साधु का मिलना मुश्किल था। उसके बेटे वाग्भट्ट के दिमाग में एक बात आई। वह तुरंत एक बहुरूपिए के पास पहुंचा। धन देने का लालच देकर उसे साधु बनाकर ले आया। उदयन ने सामने मुनिराज को देखा तो बहुत प्रसन्न हुआ। चरण-स्पर्श के लिए मुनिराज को पास बुलाया और उसी के चरणों में अपने प्राण त्याग दिए।

वाग्भट्ट जब उसे पैसे देने लगा तो उसने लेने से इंकार कर दिया। बोला-“जिस रूप को देखकर महामंत्री ने परम प्रसन्न व श्रद्धावनत होकर प्राण त्यागे, अब वह रूप नहीं बदलेगा।” सचमुच वह बहुरूपिया साधु बनकर वन में चला गया। बहुरूपियों का कहना है कि नाटक, नौटंकी और टीवी के कारण उनका पेशा लगभग समाप्त हो रहा है। अब लोग आदर नहीं देते। बच्चे जरूर हंसते हैं, पर बड़े लोग भगा देते हैं। उन्हें दुकान-दुकान, मकान-मकान भटकना पड़ता है, तब कहीं शाम को रोटी नसीब होती है। समाज व सरकार यदि बहरूपियों को पुरस्कार, सम्मान या पेंशन देने लगे तो लुप्त होती इस कला को बचाया जा सकता है।

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