पावर कॉरपोरेशन पर उपभोक्ता परिषद का आरोप- स्मार्ट प्रीपेड मीटर मामले में उपभोक्ताओं के हितों की जानबूझ कर अनदेखी

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने पावर कॉरपोरेशन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी की जा रही है। परिषद का आरोप है कि भारत सरकार द्वारा समाप्त की जा चुकी अधिसूचना के आधार पर आज भी नए बिजली कनेक्शनों पर प्रीपेड मोड की अनिवार्यता लागू की जा रही है, जिससे उपभोक्ताओं के साथ बड़ा धोखा हो रहा है।

परिषद ने इस पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री स्मार्ट प्रीपेड मीटर को आधुनिक तकनीक बताकर उपभोक्ताओं को जागरूक करने की बात कर रहे हैं, लेकिन भारत सरकार की नई अधिसूचना के बावजूद पुरानी व्यवस्था लागू रहने पर मौन साधे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने मीडिया के समक्ष पावर कॉरपोरेशन का वह आदेश सार्वजनिक करते हुए कहा कि 10 सितंबर 2025 से पूरे प्रदेश में नया बिजली कनेक्शन लेने वाले उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट प्रीपेड मीटर को प्रीपेड मोड में अनिवार्य किए जाने का आदेश जारी किया गया था। इसे भारत सरकार के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की 28 फरवरी 2022 की अधिसूचना के आधार पर उचित ठहराया गया था।

परिषद के अनुसार, विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) के विपरीत मानी जा रही इस व्यवस्था के खिलाफ परिषद ने लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ी। इसके बाद केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने संशोधन करते हुए एक अप्रैल 2026 से स्मार्ट प्रीपेड मोड की अनिवार्यता समाप्त कर दी। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में पुराने आदेश के आधार पर नए बिजली कनेक्शन केवल प्रीपेड मोड में ही दिए जा रहे हैं।

परिषद ने इसे असंवैधानिक और उपभोक्ता विरोधी बताते हुए कहा कि यह सीधे-सीधे उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन है। परिषद के अध्यक्ष एवं सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन समाप्त हो चुकी अधिसूचना का हवाला देकर जनता को भ्रमित कर रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री, जो पूर्व में केंद्र सरकार में भी कार्य कर चुके हैं, इस मामले की गंभीरता को समझने में विफल प्रतीत हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ है और इससे जनता का आर्थिक शोषण हो रहा है। परिषद ने मांग की कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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