Bareilly: रबड़ फैक्ट्री केस में श्रमिकों की एंट्री पर सरकार को ऐतराज, अब 7 मई को होगी सुनवाई
विधि संवाददाता, बरेली। दशकों से विवादों और कानूनी पेचीदगियों में फंसी कभी एशिया की कभी सबसे बड़ी सिंथेटिक्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (रबड़ फैक्ट्री) की जमीन का मामला फिर गरमा गया है।
रबड़ फैक्ट्री की 1382.23 एकड़ बेशकीमती जमीन को वापस पाने की कानूनी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। इस मामले में पक्षकार बनने के लिए पूर्व श्रमिकों की ओर दी गई अर्जियों पर राज्य सरकार ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है, जिसके निस्तारण के लिए सिविल कोर्ट ने अब 7 मई की तारीख नियत की है। डीजीसी सिविल पुरुषोत्तम पटेल ने बताया कि अदालत में स्पष्ट किया कि श्रमिक अपनी देनदारियों के लिए अलग से केस दायर करने को स्वतंत्र हैं, लेकिन भूमि के मालिकाना हक से जुड़े इस प्रकरण में उन्हें पक्षकार बनाने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
बता दें कि 1960 में प्रदेश सरकार ने रबड फैक्ट्री के लिए इस विशाल भूखंड को लीज पर दिया था, लेकिन 15 जुलाई 1999 को उत्पादन बंद होने के बाद से यह जमीन विवादों में है। लंबे समय से फैक्ट्री के मालिकान कानूनी प्रक्रिया से बच रहे थे। पिछले दिनों जब विपक्षी प्रबंधन ने सम्मन तामील नहीं किया, तो डीजीसी सिविल की अर्जी पर कोर्ट ने मुंबई के समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस जारी करने के आदेश दिए थे।
समाचार पत्रों में प्रकाशन के बाद अदालत ने अब प्रबंधन के खिलाफ सम्मन को तामील मान लिया है, जिससे प्रशासन के पक्ष में कार्यवाही आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है। फिलहाल, अब निगाहें 7 मई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां कोर्ट यह तय करेगा कि क्या श्रमिकों की दलीलों को इस मुकदमे का हिस्सा बनाया जाएगा या नहीं। सरकारी खेमे की आपत्ति के बाद अब कानूनी दांव-पेंच और दिलचस्प हो गए हैं। इस मामले में पक्षकार बनाने के लिए मीरगंज के वल्देव प्रसाद, फतेहगंज पश्चिमी के ओमवीर सिंह और एक अन्य व्यक्ति ने स्वयं को श्रमिक बताते हुए अर्जी दी थी।
