स्वच्छ हरित- बड़ा मंगल अभियान
ज्येष्ठ माह के बड़े मंगल को हर मजहब के लोग चाहे अमीर हों या गरीब, पूरी श्रद्धा से लाइन में लगकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी जिसे ‘तहजीब का शहर’ कहा जाता है, अपनी संस्कृति, चिकनकारी कढ़ाई, लजीज खानपान और ऐतिहासिक इमारतों के लिए प्रसिद्ध है। यही नहीं गोमती नदी किनारे बसे शहर में ज्येष्ठ माह की चिलचिलाती गर्मी एवं धूप में हनुमान भक्त हर बड़े मंगल को जगह-जगह बड़ी संख्या में भंडारों का आयोजन होता है। कहा जाता है कि ज्येष्ठ माह के बड़े मंगल को हर मजहब के, चाहे अमीर हों या गरीब, पूरी श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करते हैं। यहां गंगा-जमुनी तहजीब लखनऊ को पूरे विश्व में खास बनाती है।
हर्ष की बात है कि इस साल 2026 को बड़े मंगल बहुत ही विशेष रहने वाले हैं, क्योंकि इस वर्ष ज्येष्ठ माह में चार नहीं, बल्कि पांच बड़े मंगल पड़ेंगे। यह दुर्लभ संयोग 19 साल बाद बन रहा है। 2026 में बड़े मंगल की तारीखें (8 मंगल) पांच मई से 23 जून तक हैं। दूसरे, जो इसे खास बनाती है, वह यह है कि इस धार्मिक परंपरा को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की दिशा में ‘लोक भारती’ ने ‘हरित बड़ा मंगल अभियान’ की शुरुआत की है। इस पहल के तहत बड़े मंगल के अवसर पर आयोजित होने वाले भंडारों को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बनाने का संकल्प लिया गया है।
बड़ा मंगल की परंपरा को स्वच्छता, हरित सोच, सामाजिक सहभागिता से जोड़ते हुए इस बार भंडारों में सिंगल यूज प्लास्टिक का भी प्रयोग पूरी तरह से त्याग करने का संकल्प लिया गया है। भंडारों में पत्तल, बांस आदि जैविक एवं कंपोस्ट योग्य सामग्री का प्रयोग होगा। आयोजकों के कचरा प्रबंधन, कूड़ा वर्गीकरण एवं पुनर्चक्रण के बारे में प्रशिक्षण दिया जाएगा। स्वच्छता टीम एवं पर्यावरण मित्र समूह का गठन होगा।
स्वच्छ एवं पर्यावरण अनुकूल भंडारे आयोजित करना ही इस पहल का मूल उद्देश्य है, ताकि धार्मिक परंपरा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी समाज तक पहुंचे। राजधानी लखनऊ में बड़े मंगल की अपनी अलग महत्ता है। ज्येष्ठ माह के बड़े मंगल में लखनऊ के हर मंदिर में रौनक एवं जगह-जगह भंडारों का आयोजन होता है। इस दिन हनुमान जी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी माह में हनुमान जी की पहली मुलाकात भगवान राम से हुई थी।
मंदिर का पौराणिक उल्लेख: भगवान श्रीराम के कहने पर लक्ष्मण जी, माता सीता को अयोध्या से महर्षि वाल्मिकी के आश्रम लेकर जा रहे थे, रास्ते में लक्ष्मणपूरी नगरी पड़ी। लक्ष्मण टीले पर लक्ष्मण जी रुके, सीताजी ने यहीं विश्राम किया था। यहां रक्षा के लिए स्वयं बजरंगबली मौजूद रहे। तभी से इस जगह पर हनुमान रक्षक बनकर विराजमान हैं।
पुराना हनुमान मंदिर के मुख्य महंत गोपाल दास जी महाराज ने बताया कि लखनऊ में एक महामारी फैली थी, बड़ी संख्या में लोग उसकी चपेट में आने लगे। लोगों ने हनुमान जी से प्रार्थना की। महामारी खत्म हो गई। तभी से ज्येष्ठ महीने के मंगल को हनुमान जी का प्रसाद वितरण होने लगा।
लखनऊ नामा में भी मंदिर का जिक्र: डॉ. योगेश प्रवीण लखनऊ नामा में लिखते हैं कि गोमती के उस पार हनुमान के दो प्राचीन मंदिर हैं, जिस मंदिर को आज मुख्य मंदिर का महत्व दिया जाता है, वो इत्र व्यापारी लाला जाटमल ने 1783 ई. में बनाया था। यह मंदिर महंत खासाराम के अनुरोध पर तैयार किया गया था। वे आगे लिखते हैं कि अलीगंज में दूसरा हनुमान मंदिर है, जिसे सआदत अली खां की मां आलिया बेगम ने बनवाया था। आलिया रैकबार ठाकुर घराने की थीं।
बड़े मंगल के अवसर पर नवाब वाजिद अली शाह एक ब्रह्मभोज का आयोजन करते थे। बेगमों की तरफ से बंदरों को चना खिलाया जाता था। लगभग 400 वर्ष पहले प्रारंभ हुई यह धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा भाव से लगातार हर वर्ष मनाई जाती है। शहर की हर सड़क, मोहल्ले और मुख्य चौराहों पर लगभग 300–400 से अधिक भंडारे आयोजित होते हैं। भक्तों की मान्यता है कि हनुमान जी संकट मोचन हैं। वे सभी के कष्ट हरते हैं।
हनुमान जी की सबसे बड़ी सेवा प्यासे को पानी और भूखे को भोजन देना है। यही हमारा धर्म भी सिखाता है। बड़े मंगल पर स्वच्छ एवं पर्यावरण अनुकूल भंडारों का आयोजन करने में हम सभी अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें, ताकि धार्मिक परंपरा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी समाज तक पहुंचे।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
