मॉय फर्स्ट राइड: स्टीयरिंग थामने का रोमांच
आज भी वह दिन मुझे साफ-साफ याद है, जब मैंने पहली बार कार चलाने की कोशिश की थी। उस सुबह मेरे भीतर उत्साह भी था और डर भी। बचपन से ही पिता जी को बड़े आत्मविश्वास के साथ कार चलाते देखता आया था। मन में हमेशा इच्छा होती थी कि कब मैं भी स्टीयरिंग पकड़कर सड़क पर निकलूं। आखिरकार एक रविवार को वह मौका आ ही गया।
पिता जी मुझे शहर से थोड़ी दूर खाली मैदान जैसी सड़क पर ले गए। उन्होंने ड्राइविंग सीट पर बैठने को कहा। सीट पर बैठते ही ऐसा लगा जैसे कोई बड़ी जिम्मेदारी मेरे हाथों में आ गई हो। सामने स्टीयरिंग, पैरों के नीचे क्लच, ब्रेक और एक्सीलेटर सब किसी पहेली जैसे लग रहे थे। पिता जी बड़े धैर्य से हर चीज समझा रहे थे, लेकिन मेरी धड़कनें इतनी तेज थीं कि आधी बातें कानों तक पहुंच ही नहीं रही थीं।
मैंने कांपते हाथों से चाबी घुमाई। इंजन स्टार्ट होते ही मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास जागा। जैसे ही क्लच छोड़ा, कार जोर से झटके के साथ बंद हो गई। पिता जी मुस्कुरा दिए और बोले, “घबराओ मत, हर कोई ऐसे ही सीखता है।” उनकी यह बात सुनकर मेरा डर थोड़ा कम हुआ।
दूसरी बार मैंने धीरे-धीरे क्लच छोड़ा और हल्का एक्सीलेटर दबाया। इस बार कार धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। उस क्षण जो खुशी मुझे महसूस हुई, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। ऐसा लगा जैसे मैंने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। हालांकि कुछ ही सेकंड बाद सामने से एक साइकिल वाला आता दिखा और घबराहट में मैंने ब्रेक की जगह हॉर्न दबा दिया। पिता जी ने तुरंत कार संभाली और हम दोनों हंस पड़े।
धीरे-धीरे अगले कुछ दिनों में मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा। शुरुआत में जो सड़कें डरावनी लगती थीं, वही अब रोमांचक लगने लगीं। हर मोड़ पर गाड़ी मोड़ते समय ऐसा महसूस होता था जैसे जिंदगी भी मुझे संतुलन बनाना सिखा रही हो। पहली बार कार चलाने का वह अनुभव केवल ड्राइविंग सीखने तक सीमित नहीं था। उसने मुझे धैर्य, आत्मविश्वास और गलतियों से सीखने का महत्व भी सिखाया। आज जब मैं लंबी दूरी तक आराम से कार चलाता हूं, तब भी पहली बार बंद हुई वह कार और पिता जी की मुस्कान याद आते ही चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है।
सौरभ वाजपेयी, शाहजहांपुर
