सामयिकी : लोकलुभावन राजनीति और राज्यों पर बढ़ता ऋण बोझ
भारत में राज्यों का लगातार बढ़ता ऋण-से-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात आज केवल एक आर्थिक संकेतक नहीं, बल्कि देश की वित्तीय स्थिरता और सहकारी संघवाद के लिए गंभीर चेतावनी बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश राज्यों का सार्वजनिक ऋण तेजी से बढ़ा है। राजस्व घाटे, लोकलुभावन योजनाओं, कमजोर कर-संग्रह प्रणाली तथा बजट से बाहर लिए गए उधारों ने राज्यों की वित्तीय स्थिति को कमजोर किया है। भारतीय रिज़र्व बैंक और वित्त आयोगों ने भी समय-समय पर इस बढ़ती ऋण प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह संकट राज्यों की विकास क्षमता और संघीय संतुलन दोनों को प्रभावित कर सकता है।
राज्यों के बढ़ते ऋण का सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता राजस्व घाटा है। कई राज्य अपनी नियमित आय से वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी जैसे खर्चों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप उन्हें सामान्य प्रशासनिक गतिविधियों के लिए भी उधार लेना पड़ता है। यह स्थिति आर्थिक दृष्टि से अत्यंत अस्थिर मानी जाती है, क्योंकि उधार का उपयोग उत्पादक निवेश के बजाय दैनिक खर्चों में होने लगता है। पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ब्याज भुगतान और पेंशन व्यय लगातार बढ़ रहा है, जिससे विकासात्मक परियोजनाओं के लिए संसाधन सीमित होते जा रहे हैं।
लोक लुभावन राजनीति ने भी इस वित्तीय संकट को गहरा किया है। चुनावी प्रतिस्पर्धा के दौर में मुफ्त बिजली, कृषि ऋण माफी, मुफ्त परिवहन, नकद सहायता और विभिन्न प्रकार की सब्सिडी योजनाओं का विस्तार हुआ है। यद्यपि सामाजिक कल्याण योजनाएं लोकतांत्रिक शासन का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन जब वे वित्तीय क्षमता से अधिक बढ़ जाती हैं, तब वे राजकोषीय अनुशासन को कमजोर कर देती हैं। अधिकांश मुफ्त योजनाएं दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता नहीं बढ़ातीं, जिससे भविष्य में राजस्व सृजन की क्षमता कम हो जाती है और ऋण का बोझ बढ़ता जाता है।
वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता भी सीमित हुई है। पहले राज्यों के पास मूल्य वर्धित कर और अन्य अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से स्वतंत्र राजस्व स्रोत उपलब्ध थे, लेकिन अब वे काफी हद तक केंद्र के हस्तांतरण और वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति पर निर्भर हो गए हैं। कोरोना महामारी के दौरान वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति में देरी ने राज्यों की वित्तीय समस्याओं को और गंभीर बना दिया। इससे केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय मतभेद बढ़े, जिसने सहकारी संघवाद की भावना को प्रभावित किया।
कमजोर कर आधार भी राज्यों की आर्थिक कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण है। कई राज्यों में संपत्ति कर, उपयोगकर्ता शुल्क और स्थानीय निकाय कर प्रभावी ढंग से वसूले नहीं जाते। नगरपालिकाओं और पंचायतों की वित्तीय स्थिति कमजोर होने के कारण राज्यों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। डिजिटल कर प्रशासन और आंकड़ा-आधारित निगरानी के अभाव में कर चोरी और राजस्व हानि की समस्या बनी रहती है।
इसके अलावा, बजट से बाहर लिए गए उधार और छिपी हुई देनदारियां राज्यों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को और जटिल बना देती हैं। कई राज्य सार्वजनिक उपक्रमों, बिजली वितरण कंपनियों और विशेष प्रयोजन संस्थाओं के माध्यम से ऋण लेते हैं, जो आधिकारिक बजट में पूरी तरह दिखाई नहीं देते। इससे वास्तविक ऋण स्थिति का सही आकलन कठिन हो जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने कई बार चेतावनी दी है कि इस प्रकार की छिपी हुई देनदारियां भविष्य में बड़े वित्तीय संकट का कारण बन सकती हैं। (ये लेखिका के निजी विचार हैं।)
