चिट्ठियों का वह दौर और गुम होती लिखावट
एक दौर था जब डाकिया सिर्फ चिट्ठियां नहीं, बल्कि भावनाएं बांटता था। दरवाजे पर उसकी साइकिल की घंटी बजते ही पूरा घर एक अजीब सी उत्सुकता और खुशी से भर जाता था। वह दौर था कागज़ पर आड़ी-तिरछी लकीरों में दिल का हाल बयां करने का, अपनों की लिखावट को छूकर उनकी मौजूदगी को महसूस करने का, लेकिन आज, तकनीक की चकाचौंध में वह चिट्ठियों का खूबसूरत दौर और इंसानी जज्बातों से भीगी वह लिखावट कहीं गुम हो गई है। चिट्ठी सिर्फ संदेश पहुंचाने का साधन नहीं थी, बल्कि वह एक मुकम्मल अहसास थी। जब कोई अपने हाथ से पेन उठाकर कागज़ पर शब्द उकेरता था, तो उसमें सिर्फ स्याही नहीं फैलती थी, बल्कि लिखने वाले के दिल की धड़कनें और उसकी मनोदशा भी साफ नजर आती थी, जिसमें लिखे हर शब्द कागज़ पर धड़कते जज्बात होते थे
अक्षरों का कांपना, कहीं स्याही का फैल जाना या फिर आंसू की एक बूंद से पन्ने का वो कोना धुंधला हो जाना। ये सब वो अनकहे संदेश थे जिन्हें आज के इमोजी कभी बयां नहीं कर सकते। चिट्ठियों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही थी कि उन्हें सहेज कर रखा जा सकता था। अलमारी के किसी कोने में,किताबों के बीच या तकिए के नीचे छिपी वे चिट्ठियां सालों बाद भी उतनी ही ताज़ा लगती थीं, जितनी पहली बार पढ़ने पर।
आज हम व्हाट्सएप, ईमेल और सोशल मीडिया के दौर में जी रहे हैं। पलक झपकते ही सात समंदर पार बैठे शख्स को वीडियो कॉल पर देखा जा सकता है। दूरियां यकीनन मिट गई हैं, लेकिन इस रफ्तार ने हमारी बातचीत से वह 'ठहराव' छीन लिया है जो चिट्ठियों के दौर की आत्मा था। चिट्ठी लिखकर हफ्तों उसके जवाब का इंतजार करने का जो मीठा सस्पेंस था,वह 'ब्लू टिक' के इस दौर में गायब हो चुका है। अब संवाद तुरंत होता है,पर उसमें वह गहराई और बेसब्री नहीं होती। इससे डिजिटल क्रांति और सिमटती दूरियां साफ़ नजर आ रही है ।
चिट्ठियों के जाने के साथ जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वह है हमारी लिखावट का खो जाना। हर इंसान की लिखावट उसकी पहचान होती थी। मां के हाथ के लिखे अक्षर,पिता की वो कड़क और अनुशासित लिखावट,या किसी दोस्त के टेढ़े-मेढ़े शब्द..इन्हें देखकर ही पता चल जाता था कि लिखने वाला हमसे कितना जुड़ा है। आज की कीबोर्ड टाइपिंग ने हम सबकी लिखावट को एक जैसा,नीरस और यांत्रिक बना दिया है। टाइम्स न्यू रोमन या एरियल फॉन्ट में अब वो अपनापन नहीं मिलता जो हाथ से लिखे 'प्रिय' या 'सादर प्रणाम' में होता था।
वक्त के साथ बदलना लाज़मी है और तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान भी बनाया है। लेकिन इस डिजिटल शोर-शराबे के बीच, कभी-कभी दिल उस शांत और सुकून भरे दौर को मिस करता है। कभी फुर्सत के पलों में, किसी अपने के लिए एक छोटा सा खत अपने हाथ से लिखकर देखिए। विश्वास मानिए,स्क्रीन पर टाइप किए गए सौ मैसेजेस से ज्यादा खुशी,कागज़ पर बिखरी आपकी उंगलियों की वह लिखावट दे जाएगी। चिट्ठियों का वो दौर भले लौटकर न आए, पर उस अहसास को हम अपनी यादों में हमेशा जिंदा रख सकते हैं।
