परवीन शाकिर की पुण्यतिथि पर विशेष: शाम के वक़्त सफ़र क्या करते…

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पाकिस्तान की लोकप्रिय शायरा मरहूम परवीन शाकिर को उर्दू शायरी के तीसरे पड़ाव का एक मीलस्तम्भ माना जाता है। उनकी शायरी खुशबू के उस सफ़र की तरह है जो दिमाग का नहीं, रूह की गहराईयों का स्पर्श करती है। परवीन ने स्त्री के प्रेम, उसकी भावुकता, उसके एकांत, उसकी निजी और वैचारिक स्वतंत्रता, उसकी जिजीविषा, …

पाकिस्तान की लोकप्रिय शायरा मरहूम परवीन शाकिर को उर्दू शायरी के तीसरे पड़ाव का एक मीलस्तम्भ माना जाता है। उनकी शायरी खुशबू के उस सफ़र की तरह है जो दिमाग का नहीं, रूह की गहराईयों का स्पर्श करती है। परवीन ने स्त्री के प्रेम, उसकी भावुकता, उसके एकांत, उसकी निजी और वैचारिक स्वतंत्रता, उसकी जिजीविषा, उसके स्वाभिमान और उसके अथक संघर्षों का जैसा सजीव और हृदयस्पर्शी चित्र खींचा है, उससे गुज़रना एक विरल अनुभव है।

परवीन की शायरी में यथास्थिति के खिलाफ प्रतिरोध तो है, लेकिन उस प्रतिरोध का स्वर कर्कश नहीं, मुलायम है। यह मुलायमियत ही उनकी शायरी की रूह है। मात्र बयालीस साल की उम्र में एक सड़क दुर्घटना में दिवंगत परवीन की कविताओं में एक जीवंत लड़की भी है, प्रेमिका भी, पत्नी भी, कामकाजी स्त्री भी, मां भी और पुरूषों की दुनिया में पांव टिकाने की जद्दोज़हद करती एक ख़ुद्दार औरत भी।

यानी एक मुकम्मल औरत उनकी कविताओं में सांस लेती है। अपनी नज़्मों और ग़ज़लों में उन्होंने न सिर्फ प्रेम और विरह के ज़ुदा-ज़ुदा रंगों की कसीदाकारी की है, बल्कि आधुनिक स्त्री-जीवन के उन अछूते मसलों को भी छुआ जिनपर पारंपरिक शायरों की नज़र नहीं गई। बेवज़ह नहीं कि आज की युवा पीढ़ी की वे सबसे प्रिय शायरा हैं।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें ख़ेराज-ए-अक़ीदत, उनकी ही एक ग़ज़ल के चंद अशआर के साथ-

अब भला छोड़ के घर क्या करते
शाम के वक़्त सफ़र क्या करते

तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं
अपने आने की ख़बर क्या करते

वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था
साए फैला के शजर क्या करते

राय पहले से बना ली तू ने
दिल में अब हम तिरे घर क्या करते

इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे
हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते

  • ध्रुव गुप्त

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