क्या है लोकपर्व सातूं-आठूं, जानिए इस पर्व की खास बात…

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हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में सप्तधान्य भिगोने के साथ ही लोकपर्व सातूं-आठूं का आगाज हो गया है। गुरुवार को अमुक्ता भरण सप्तमी मनाई गई। आपको बता दें कि कुमाऊं का प्रसिद्ध लोकोत्सव आठूं अमुक्ताभरण सप्तमी तथा दुर्गाष्टमी को गौरा महेश की पारंपरिक पूजा के बाद आठ पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीतों …

हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में सप्तधान्य भिगोने के साथ ही लोकपर्व सातूं-आठूं का आगाज हो गया है। गुरुवार को अमुक्ता भरण सप्तमी मनाई गई। आपको बता दें कि कुमाऊं का प्रसिद्ध लोकोत्सव आठूं अमुक्ताभरण सप्तमी तथा दुर्गाष्टमी को गौरा महेश की पारंपरिक पूजा के बाद आठ पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीतों और लोक नृत्यों की धूम मच जाती है।

 

 

वैसे विरूड़ा पंचमी के दिन सप्त धान्यों को भिगोने के साथ इस पर्व की औपचारिक रुप से शुरुआत हो जाती है गांव में इस पर्व के प्रति काफी उत्साह दिखाई देता है लोक गायक अपने ढ़ोल-ढ़ोलक तैयार रखते हैं। वर्षा ऋतु के सबसे रंगीले उत्सव को मनाने में वह कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं। सांतू-आंठू त्यौहार में तीन-चार दिन कुमाऊंनी लोक गीत और लोक नृत्य झोड़ा ,चांचरी आदि की धूम मची रहती है। गांव की महिलाएं , पुरुष रोज शाम को ,आनंद के साथ पुरे गावं की सुख समृद्धि के लिए ,नाचते गाते हैं, आनंद उत्सव मानते हैं।

सातूं-आठूं लोक पर्व भगवान् के साथ मानवीय रिश्ते बनाकर ,उनकी पूजा अर्चना और उनके साथ आनंद मानाने का त्यौहार है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ व कुमाऊं के सीमांत क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रतिवर्ष भाद्रपद की पंचमी से शुरू होकर अष्टमी तक चलता है।

सातूं आठूं पर्व में महादेव शिव को जीजा और माँ गौरी को दीदी के रूप में पूजने की है परम्परा है
सातूं आठूं का अर्थ है सप्तमी और अष्टमी का त्यौहार। भगवान शिव को और माँ पार्वती को अपने साथ दीदी और जीजा के रिश्ते में बांध कर यह त्यौहार मनाया जाता है। यही इस त्यौहार की सबसे बड़ी विशेषता है। कहते हैं ,जब दीदी गौरा( पार्वती ) जीजा मैशर (महेश्वर यानि महादेव ) से नाराज होकर अपने मायके आ जाती है ,तब महादेव उनको वापस ले जाने ससुराल आते है। दीदी गौरा की विदाई और भिनज्यू यानि जीजाजी मैशर की सेवा के रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। यह त्योहार कुमाऊं सीमांत में सातूं आठूं के नाम से तथा ,नेपाल में गौरा महेश्वर के नाम से मनाया जाता है। इस लोक पर्व को गमारा पर्व भी कहा जाता है।

भाद्रपद की पंचमी बिरुड़ पंचमी से शुरू होती है पर्व की तैयारी
भाद्रपद की पहली पंचमी से शुरू होती है त्यौहार की तैयारी , भाद्र पंचमी को बिरुड पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन एक साफ ताबें के बर्तन में ,गाय के गोबर से पंच चिन्ह बनाकर उसपे दुब अक्षत करके उसमे पांच या सात प्रकार का अनाज भिगोने डाल दिया जाता है। इन अनाजों में मुख्यतः गेहू ,चना, सोयाबीन , उड़द ,मटर,गहत, क्ल्यु बीज होते हैं। सातूं (सप्तमी) के दिन जल श्रोत पर धो कर ,आठूं (अष्टमी) के दिन गमारा मैशर (गौरी महेश ) को चढ़ा कर ,फिर स्वयं प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। तथा सभी लोग ऐसे बिरुड रूप में चढ़ाकर आशीष देते हैं।

सातों के दिन सजाई जाती है गमरा दीदी
सातों (सप्तमी ) के दिन महिलाये इक्क्ठा ,होकर गांव के प्राकृतिक जल स्रोत पर जाती हैं। पांच जगह अक्षत करके ,मगल गीत गाते हुए , वहां बिरूड़ो को धो कर लाती हैं। बिरुडो को वापस पूजा घर में रख कर ,गमारा दीदी का श्रृंगार किया जाता है। गमारा दीदी पर्वती को बोलते हैं। गमारा दीदी का श्रृंगार के लिए महिलाएं सोलह श्रंगार करके धान के खेत से एक विशेष पौधा सौं और धान के पौधे लाती हैं। उससे डलिया में गमरा दीदी को सजाया जाता है। फिर लोकगीत गाते हुए गाँव के उस स्थान पर रख देते हैं, जहां बिरुड़ पूजा का आयोजन होता हैं। और पंचमी के दिन भिगाये गए उन बिरुड़ से गमरा दीदी ( गौरी मा) की पूजा होती है। इस शुभावसर पर अखंड सौभाग्य और संतान की मंगल कामना के लिए सुहागिन महिलाएं, गले व हाथ मे पीली डोर धारण करती हैं। पुरोहित सप्तमी की पूजा करवाते हैं। महिलाएं ,लोकनृत्य तथा लोकगीतों का आनंद लेती हैं।

आठूं ( अष्टमी ) के दिन भिन्ज्यू महेश्वर (महादेव) गमारा दीदी ( पार्वती ) को मनाने आते हैं ससुराल
आठूं (अष्टमी) के दिन सभी महिलाएं एक स्थान पर जमा होकर , खेतों में से डलिया में सौं और धान के पौधे लेकर भिन्ज्यू महेश्वर (भगवान शिव ) की प्रतिमा बनांते हैं। और लोकगीतों के साथ उन्हें माँ पार्वती के साथ स्थापित किया जाता है। ऐसी मान्यता है,कि इस दिन भगवान शिव रूठी हुई माँ पार्वती को मनाने ससुराल आते हैं। पंडित जी पूजा करवाते है। बिरुड़ चढ़ाए जाते हैं। तथा एक महिला सभी को सांतू आंठू की कथा या बिरुड़ अष्टमी की कथा सुनती है।

बिरुड़ अष्टमी की कथा सातूं आठूं पर्व की कथा
एक गांव में बुजुर्ग दम्पति के सात पुत्र और सात बहुएं थी। किन्तु किसी को भी संतान प्राप्ति नही थी। इस कारण बुजुर्ग दंपत्ति बहुत दुखी थे। एक बार वह आदमी कहीं जा रहा था, उसे रास्ते मे ,सोलह श्रंगार की हुई औरतें बिरुड़ धोते हुए दिखी,तो उसने जिज्ञासावश पूछ लिया कि आप क्या कर रही हो ? तो उन महिलाओं ने कहा कि, वे गौरा महेश के लिए बिरुड़ धो रही हैं। उस आदमी ने कहा कि इससे क्या होता है ? तब महिलाओं ने सातो आठो पर्व के बारे में विस्तार से उनको समझा दिया।

सारी जानकारी लेकर वह मनुष्य उत्साहित होकर बोला , मैं भी सातूं आठूं ,बिरुड़ अष्टमी का अनुष्ठान करूंगा,अपने परिवार में। घर जाकर उसने अपनी पत्नी को बताया। पत्नी ने अपनी सबसे लाड़ली बहु को बुलाया ,उसे बिरुड़ का विधान करने को कहा। उस बहु ने बिरुड़ भीगाते समय चख लिए ,तब सास ने कहा की तुमने इस को चख कर इसका विधान खंडित कर दिया है। फिर उसने दूसरी बहु को बुलाया , उसने भी यही गलती की। ऐसा करते करते उसने सभी 6 बहुओं को बुलाया सभी ने कोई न कोई गलती करके विधान खंडित कर दिया। अंत में उसने अपनी सातवीं बहु को बुलाया , इस बहु को वह बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। वो लोग उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे , इसलिए अंत में उसको बोला कि तुम बिरुड़ भिगाओ। बहु ने नहाया धोया और पुरे विधि विधान से बिरुड़ भीगा दिए। कुछ समय बाद ,वो गर्भवती हो गई। अगला सातों आठों आने से पहले उसका पुत्र भी हो गया। इधर घर में संतान तो आ गई लेकिन जो बहु नापसंद थी उसकी संतान हुई। अब सास को बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। इधर सास ने अपने पति को बोला नए बालक के बारे में पंडित जी से पूछ कर आओ। उधर सास पति से पहले जाकर पंडित को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया ,उसको बोला की तुम बच्चे के बारे में नकारात्मक बोलना। पंडित मान गया।

कुछ दिन बाद फिर पर्व आने वाला था, तब सास ने अपनी आखिरी बहु से कहा की , मुझे पता चला है ,की तुम्हारे पिता की मृत्यु हो गई है। तुझे वहां जाना चाहिए बच्चे को मैं देख लूंगी। बेटी रोते बिलखते अपने मायके गई ,जिस दिन मायके गई उस दिन आठूं था ,और उसके मायके में बढ़िया पूजा चल रही थी। उसकी मां ने अपनी बेटी को मायके में देखा तो पूछा ,आज तो त्यौहार है ,तुझे ससुराल में होना चाहिए ,तू यहां क्या कर रही है ? और तेरा बेटा कहां है ? बेटी ने सारा वृतांत अपनी मां को बता दिया। तब मां ने कहा पुत्री मुझे तेरा पुत्र खतरे में है। उधर पंडित ससुर को बालक के बारे में गलत जानकारी देता है। बोलता है यह बालक अपशकुनी है। जब पति निराश घर लौटा तो सास इसी मौके का फायदा उठा कर पति को भड़का देती है ,और बच्चे को मारने की बात करती है। दोनों मिलकर बच्चे को पास के नौले में डुबाकर आ जाते हैं।

उधर बहु रास्ते भर सरसों फेंकते आती है , और वो हरी भी हो जाती है। जब वो नौले के पास पहुंचती है तो, वहां उसकी छाती भर आती है ,और वह नौले में अपनी दूध से सनी छाती को धोने उतरती है ,तो बच्चा उसके गले में पड़ी सातूं आठूं की डोर को पकड़ लेता है। वह अपने बच्चे को लेकर ससुराल पहुंचती है। तब उसकी सास कहती है ,मैंने तो इसे मरने के लिए छोड़ दिया था ,तुझे यह जिन्दा कैसे मिला ? तब बहु ने कहा कि मुझे मेरे अच्छे कर्मो का फल मिला है। मैंने लोगो की भलाई की इसलिए मुझे अच्छा फल मिला। तब सास को अपनी गलती का अहसास होता है। वो अपने किये पर माफ़ी मांगती है।

इस कथा की समाप्ति के बाद बिरुड़ को पकाकर उनका प्रसाद बनाया जाता है। गौरी महेश को चढ़ाने के बाद लोग एक दूसरे को चढ़ाते व बांटते हैं।

लोकगीतों एवं लोक नृत्यों की धूम रहती है पर्व में
तीन-चार दिन कुमाऊंनी लोक गीत और लोक नृत्य झोड़ा ,चचेरी आदि की धूम मची रहती है। गांव की महिलाएं , पुरुष रोज शाम को ,आनंद के साथ पूरे गावं की सुख समृद्धि के लिए ,नाचते गाते हैं। आनंद उत्सव मानते हैं।

फौल फटकना की रस्म
सातूं आठूं के शुभ अवसर पर एक विशेष रस्म भी निभाई जाती है। इस रस्म में एक बड़े कपडे के बीच में बिरुड़ और फल रखते हैं। फिर दोनों तरफ से पकड़ कर उसे ऊपर को उछालते हैं। शादी शुदा महिलाएं और कुवारी कन्यायें अपना आंचल फैलाकर इसे समेटने की कोशिश करती हैं। जिसके आंचल में यह फल और प्रसाद अटकते हैं , ऐसा माना जाता है की उन्हें अखंड सौभाग्य और मंलकारी संतान की प्राप्ति होती है।

गमरा महेशर की विदाई
गमरा दीदी और भिनज्यू के साथ आनंद के दिन बिताने के बाद ,उनकी विदाई का समय भी आ जाता है। लोग अपनी बेटी और जमाई को ,लोकगीत और ढोल नगाड़ों की धूम के साथ विदा करते हैं। गोरी महेश की मूर्ति को स्थानीय मंदिर में विसर्जित कर दिया जाता है। जिसे सिवाना या सिला देना की रस्म भी कहा जाता है। सातो आठो पर्व के बाद पिथौरागढ़ में कही कही हिलजात्रा का आयोजन भी किया जाता है।

 

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