बरेली: देसी व्यंजनों का स्वाद चढ़ा तो पिज्जा छोड़ बन जाएंगे मुरीद
बरेली, अमृत विचार। पिज्जा, बर्गर, मैगी जैसे फास्ट फूड खाकर जवान होती नई नस्लों की जुबान पर शायद मक्के की रोटी और सरसों के साग, देसी घी के तड़के की दाल का स्वाद नहीं चढ़ा है। चढ़ जाए तो आयातित विदेशी पकवान किनारे रखकर देसी व्यंजन के मुरीद बन जाएंगे। इसलिए क्योंकि देसी सदाबहार है। …
बरेली, अमृत विचार। पिज्जा, बर्गर, मैगी जैसे फास्ट फूड खाकर जवान होती नई नस्लों की जुबान पर शायद मक्के की रोटी और सरसों के साग, देसी घी के तड़के की दाल का स्वाद नहीं चढ़ा है। चढ़ जाए तो आयातित विदेशी पकवान किनारे रखकर देसी व्यंजन के मुरीद बन जाएंगे। इसलिए क्योंकि देसी सदाबहार है।
देसी का महत्व वर्ष 1978 में दक्षिण-पूर्वी एशिया में धान की फसल पर मंडराये राइस टुंगरों वायरस से समझ सकते हैं। बरेली कॉलेज के वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डा. आलोक खरे बताते हैं कि वायरस से धान की सभी प्रजातियां तबाह हो गईं थीं। तब पश्चिमी यूपी के कुछ किसानों के पास धान की देसी प्रजातियां मिलीं। जिन्हें उगाकर उत्पादन बेहतर किया गया।
आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसकी थीम है ‘जैव विविधता एवं उसका सतत संरक्षण’। डा. खरे के मुताबिक जीवन एकरसता में नहीं बल्कि विविधता में बसता है। वर्तमान में पृथ्वी पर पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं की 16 लाख से अधिक प्रजातियां हैं। विश्व में 6000 पौधे ऐसे हैं, जिन्हें खाने के लिए उगाया जाता है।
जानकर हैरत होगी कि इन पेड़-पौधों का 66 प्रतिशत भाग केवल नौ प्रजातियों का है।सामान्य भाषा में इसे मोनोकल्चर कहा जाता है। हमारे खान-पान में विविधता होती थी, जो नष्ट होती जा रही है। मसलन, भारत में धान की 5000 प्रजातियां होती थीं। अब बमुश्किल 50 बची हैं। हमारे माता-पिता ने जो अनाज खाए। वे हमारी थाली से गायब हैं। चंद सब्जियां ही बची हैं।
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑग्रेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक खाद्यान्न के लिए उगाए जाने वाले कुल पेड़-पौधों का 66 प्रतिशत भाग केवल नौ प्रजातियां देती हैं। इसमें गन्ना, मक्का, चावल, गेहूं, आलू, सोयाबीन, पाम ऑयल, सुगर बीट (चुकंदर) और कसावा शामिल है। अनाज में धान, गेहूं, मक्का का वर्चस्व है।
डा. खरे के मुताबिक विविधता ही जीवन रक्षक है। एक ही तरह की फसलें उगाने में एक प्रकार के रसायन उपयोग होते। भविष्य में जब इन प्रजातियों पर संकट छाएगा, तो हमारे पास पुरानी प्रजातियां नहीं होंगी। इस स्थिति में खाद्यान्न का संकट पड़ेगा। जैसा 1840 में आयरलैंड में आलू की फसल को नुकसान होने पर अकाल के रूप में हुआ था।
