केंद्र की रोक

केंद्र की रोक

केंद्र सरकार ने कक्षा एक से आठ तक के छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति बंद कर दी है। केंद्र सरकार का कहना है कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम-2009 के तहत आने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आरटीई सरकार के लिए प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य बनाता है। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति में, केंद्र और राज्य सरकारें 75:25 के अनुपात में वित्तीय भार साझा करती हैं।

योजना उन्हीं छात्रों के लिए थी जिनके माता-पिता की आय प्रति वर्ष 2.50 लाख रुपये से अधिक नहीं है। यह राशि एक वर्ष में 10 महीने की अवधि के लिए प्रदान की जा रही थी। कक्षा एक से पांच तक के विद्यार्थियों को एक वर्ष में एक हजार रुपये दिए जाते हैं, जबकि छठवीं से आठवीं तक के लिए छात्रवृत्ति की राशि अलग-अलग है। अब प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति सिर्फ कक्षा नौ और 10 के पात्र विद्यार्थियों को मिलेगी।

सोमवार को उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि प्रदेश के मदरसों में भी कक्षा एक से कक्षा आठ तक में पढ़ने वाले छात्रों को शैक्षिक सत्र 2022-23 से छात्रवृत्ति नहीं दी जाएगी। केन्द्र सरकार की ओर से इस बारे में निर्देश जारी कर दिए गए हैं। ध्यान रहे जून, 2006 में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए मैट्रिक-पूर्व स्तर पर छात्रवृत्ति शुरू की गई थी।

उस समय कहा गया था कि मैट्रिक-पूर्व स्तर पर छात्रवृत्ति, अल्पसंख्यक समुदायों के माता-पिता को इस बात के लिए प्रोत्साहन करेगी कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजें और अपने शिक्षा के संबधित वित्तीय बोझ को कम करें और अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा को पूरा करने में उनके प्रयासों में सहयोग करें। उम्मीद जताई गई थी कि यह योजना उनके शैक्षणिक प्राप्ति के लिए आधार तैयार करेगी। शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण, जो इस योजना के उद्देश्यों में से एक है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों की सामाजिक आर्थिक स्थितियों के उत्थान की संभावना है।

अब छात्रवृत्ति बंद कर दिए जाने पर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। सरकार के इस प्रयास को बच्चों के अधिकारों को कम करने और इस तरह उनके मौलिक अधिकार को कमजोर करने का प्रयास बताया जा रहा है। निश्चित रुप से आरटीई एक मौलिक अधिकार है और प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति छात्रों के शैक्षिक उत्थान के लिए एक सरकारी योजना है। केंद्र सरकार के इस कदम के परिणामस्वरूप प्राथमिक स्तर पर नामांकन में कमी आएगी और अधिक ड्रॉप आउट होंगे। सरकार मान रही है कि अब बच्चों को छात्रवृत्ति देने का कोई औचित्य नहीं है जबकि सकारात्मक कार्रवाई के लिहाज से यह एक प्रतिगामी कदम है।

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