करियर डिसीजन में क्यों झिझकते हैं स्टूडेंट्स

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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सूचनाओं, अवसरों और विकल्पों की बढ़ोतरी ने बाहरी जीवन को तेज बनाया है, लेकिन निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर। प्रगति की यह निरंतर दौड़ मन को उस मोड़ पर ले आई है, जहां कदम आगे बढ़ते हैं, पर भीतर दिशा स्पष्ट नहीं होती। तकनीक ने दुनिया बदल दी है। आज जानकारी की इतनी अधिकता है कि किसी को कुछ जानने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती। फोन उठाइए और दुनिया सामने है, लोग कहां घूम रहे हैं, कौन कितना कमा रहा है, किसकी जिंदगी कितनी शानदार दिख रही है। पर एक विरोधाभास भी जीवन के बीच खड़ा है। जैसे-जैसे दुनिया बाहरी रूप से आसान हुई है, भीतर मन उतना ही जटिल हो गया है। जितनी सुविधा मिली है, उतनी ही बेचैनी बढ़ी है, जितने विकल्प बढ़े हैं, उतनी ही दृढ़ता कम हुई है। कई बार ऐसा लगता है कि हम जितने सक्षम हुए हैं, उतने ही अनिश्चित भी।

इस अनिश्चितता के पीछे पांच ऐसे मनोवैज्ञाानिक भाव अथवा रूप हैं, जो आज के समय की नब्ज को समझने की कुंजी हो सकते हैं- FOMO, FOFO, FOBO, FOPO और FOMU।  ये नाम भले अंग्रेज़ी में हों, लेकिन इनमें जो भाव छिपे हैं, वे किसी भाषा, क्षेत्र या समाज की सीमा में नहीं रहते। स्टूडेंट्स पर करियर को लेकर इनका असर दिखाई देता है। फर्क बस इतना है कि इनके नाम बहुत कम लोग जानते हैं, पर इनके प्रभाव से लगभग हर कोई गुजर रहा है।-डॉ. शिवम भारद्वाज , असिस्टेंट प्रोफेसर, मथुरा

क्या हैं ये फियर

पहले आता है FOMO (फियर ऑफ मिसिंग आउट) कुछ छूट जाने का डर। सोशल मीडिया के विस्तार के साथ ही लोगों की जिंदगी दूसरों की नजरों के सामने खुलने लगी। हर उपलब्धि, हर अवसर, हर खुशी और हर सफलता अब सार्वजनिक हो गई। तुलना वहीं से शुरू हुई, जो दूसरे कर रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि हम कुछ कम कर रहे हैं। हर पार्टी, हर यात्रा, हर प्रमोशन, हर समारोह, हर तस्वीर मानो एक संदेश देती है-“देखो, तुम पीछे रह रहे हो।” यही डर व्यक्ति को लगातार दौड़ में धकेलता है। वह उन कामों की तलाश में रहने लगता है, जो उसे “पीछे छूटने” की भावना से बचा लें। किंतु विरोधाभास यह है कि जितना इंसान दौड़ता है, उतना ही उसे लगता है कि अभी भी बहुत कुछ छूट रहा है। यह डर प्रेरणा से ज्यादा दबाव पैदा करता है, उपलब्धि से ज्यादा अधूरापन बढ़ाता है।

FOFO (फियर ऑफ फाइन्डिंग आउट)

यहीं एक और भाव जन्म लेता है- FOFO (फियर ऑफ फाइन्डिंग आउट), यानी सच जानने का डर। जब स्टूडेंट्स दौड़ में लगा रहता है और फिर भी खुद को पीछे महसूस करता है, तो सच्चाई डरावनी लगने लगती है। कोई रिपोर्ट हो, नतीजा हो, फीडबैक हो, मेडिकल जांच हो, करियर या रिश्तों पर बातचीत हो या आर्थिक स्थिति की हकीकत बहुत से लोग इन्हें केवल इसलिए टालना चाहते हैं या टालते हैं कि सच सामने आ गया, तो मन को स्वीकार करना पड़ेगा कि सब उतना सुंदर नहीं जितना मान रखा है या दिखता है। ऐसे में मन यह मानने लगता है कि “न जानना” अस्थायी राहत देता है। अनिश्चितता सुरक्षित लगती है, लेकिन यही बचाव आगे और कठिनाइयां पैदा करता है, क्योंकि सच्चाई जितनी देर बाद सामने आती है, उतनी भारी हो जाती है।

FOBO (फियर ऑफ अ बेटर ऑप्शन)   

इसी तरह आगे बढ़कर मन FOBO (फियर ऑफ अ बेटर ऑप्शन) में प्रवेश करता है यानी बेहतर विकल्प छूट जाने का डर। आधुनिक जीवन में चुनाव आसान नहीं रहे। नौकरी हो या शहर, शादी हो या करियर, व्यवसाय हो या मकान हर जगह इतने विकल्प हैं कि किसी एक विकल्प को अपनाने का मतलब है बाकी सब छोड़ देना। तब मन बार-बार पूछता है- “जो चुना, इससे बेहतर भी कुछ हुआ तो?” और इस सवाल के चलते फैसला लेना मुश्किल होता जाता है। बहुत से लोग सपनों के रास्ते पर इसलिए नहीं निकल पाते, क्योंकि वे गलत राह चुनने से अधिक डरते हैं। वे दिशा तय करने में इतना समय लगा देते हैं कि सफर शुरू ही देर से होता है। यही वजह है कि फैसलों की संख्या से ज्यादा दुविधाओं की मात्रा बढ़ती है।

FOMU (फियर ऑफ मेसिंग अप)

 फियर ऑफ मेसिंग अप अर्थात गलती कर देने का डर। यह शब्द भले ही बहु-प्रचलित न हो, लेकिन इसका अनुभव लगभग हर पीढ़ी महसूस कर रही है। ऐसे में कई बार व्यक्ति पहला कदम इसलिए नहीं उठाता, क्योंकि उसे लगता है, अगर गलती हो गई, तो दुनिया देख लेगी। असफलता की चिंता से ज्यादा अपमान की कल्पना भयावह हो जाती है। सपने और योजनाएं आदर्श रूप में तो टिकी रहती हैं, पर वास्तविक शुरुआत रुक जाती है। यही वह दुखद क्षण है, जहां जिंदगी निर्णय से नहीं, डर से चलने लगती है। यह डर अक्सर बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर से पैदा होता है।

    इन पांचों भावों को अलग-अलग नाम देना आसान है, पर इन्हें अलग-अलग होकर समझना गलत है। ये एक-दूसरे से पैदा होते हैं, एक-दूसरे को बढ़ाते हैं और एक-दूसरे के बिना पूरी तरह समझ नहीं आते। कुछ छूट जाने का डर स्टूडेंट्स को दौड़ में धकेलता है, दौड़ की थकान उसे सच से बचने पर मजबूर करती है, सच से बचाव निर्णय को टाल देता है, निर्णय में देरी दूसरों की राय पर निर्भरता पैदा करती है और यही निर्भरता गलती को असहनीय बना देती है। यह कोई वैज्ञानिक रूप से तय “अनिवार्य क्रम” नहीं, लेकिन आधुनिक मन की चालकों समझने का एक बेहद उपयोगी मनोवैज्ञानिक चक्र जरूर है- एक ऐसा पैटर्न, जिसमें जीवन ऊपर से सक्रिय दिखता है, पर भीतर से स्थिर बना रहता है। लगता है कि हम बहुत कुछ कर रहे हैं, पर महसूस होता है कि कुछ भी पूरा नहीं हो पा रहा।

    इन मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोष देना नहीं है और न ही यह मान लेना कि इंसान कमजोर हो गया है। यह समय ही ऐसा है, जिसमें मन पर दबाव पहले से कहीं अधिक है। जितना समाज सार्वजनिक हुआ है, उतनी ही निजी दुनिया उलझी है। उपलब्धियों की प्रतिस्पर्धा में भावनाएं पीछे छूट गई हैं। हम सब किसी-न-किसी रूप में इस संघर्ष में हैं कुछ खुलकर, कुछ चुप रहकर, कुछ जानकर और कुछ जाने बिना।

    हो सकता है आगे भी जीवन जटिल बना रहे, अवसर बढ़ते रहें, विकल्प उलझाते रहें, लेकिन इतना समझ होगा कि डर होना कमजोरी नहीं, संवेदनशीलता है। संघर्ष होना असामान्य नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन का हिस्सा है। हम सब अपनी-अपनी जगह पर कोशिश कर रहे हैं- कभी तेज, कभी धीमे या कभी डरे हुए।

    जीवन में ज्यादातर बदलाव किसी “बड़े कदम” से नहीं आते। कई बार बदलाव तब शुरू होता है, जब हम बस इतना स्वीकार कर लेते हैं कि हां, हम डरे हुए हैं, पर कोशिश छोड़ने वाले नहीं हैं। हो सकता है आगे भी निर्णय आसान न हों, संतुलन, स्पष्टता और आत्मविश्वास एक दिन में न आएं, लेकिन इतना तो तय है कि जिंदगी अक्सर वहीं खुलती है, जहां मन सबसे ज्यादा अटका होता है।

    डर पूरी तरह चला जाए, तब चलना शुरू हो, यह जिंदगी का नियम नहीं है। असली बात यह है कि डर रहते हुए भी चलना शुरू हो, क्योंकि साहस का अर्थ डर के अभाव में बहादुरी दिखाना नहीं, बल्कि डर के साथ कदम बढ़ाना है। वही पहला कदम, चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, आगे की असली दिशा बनाता है।

FOPO (फियर ऑफ अदर पीपल्स ओपिनियन)  

जब फैसले देर से होने लगते हैं और आत्मविश्वास हिलने लगता है, तो अगला भाव FOPO(फियर ऑफ अदर पीपल्स ओपिनियन) जन्म लेता है- लोगों की राय का डर। अपनी पसंद पर भरोसा कम होने के बाद व्यक्ति दूसरों की प्रतिक्रिया को मार्गदर्शक बना लेता है। फिर चुनाव अंदर की जरूरतों से नहीं, बाहर की नजरों से होते हैं। कौन-सी जीवनशैली “स्वीकार्य” होगी, कौन-सी नौकरी “सम्मानजनक दिखेगी” इस तरह के तमाम सवाल अंदर की आवाज को दबाते जाते हैं। जीवन धीरे-धीरे निजी नहीं, भीड़ के मानदंडों से संचालित होने लगता है। व्यक्ति वही बनने की कोशिश करता है, जो दूसरों को पसंद आए, भले वह स्वयं उस भूमिका में सहज न हो। वह “दिखने वाले” सम्मान के बदले “महसूस होने वाली” शांति खोने लगता है और अंत में इस पूरी यात्रा की परिणति होती है। 

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