पंचायत चुनाव : ‘मनरेगा’ बनाम ‘जी राम जी’ की होगी परीक्षा
लखनऊ, अमृत विचार : प्रदेश में पंचायत चुनाव की सरगर्मी बढ़ते ही गांवों की चर्चा फिर योजनाओं पर टिक गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बहस किसी सड़क, नाली या हैंडपंप की नहीं, बल्कि रोजगार की पहचान की है। एक ओर वर्षों से गांव की अर्थव्यवस्था का परिचित चेहरा रही मनरेगा है, दूसरी ओर सरकार की नई पेशकश ‘विकसित भारत–जी-राम-जी (ग्रामीण)’। यही टकराव अब पंचायत चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
मनरेगा गांव के लिए सिर्फ काम की योजना नहीं रही, बल्कि संकट के समय सहारा बनती आई है। सूखा हो या महामारी, यही योजना गांव में नकद आय का भरोसा देती रही। इसलिए जब इसके नाम और ढांचे में बदलाव की बात आई, तो विपक्ष को सियासी मौका दिख गया। कांग्रेस इसे सीधे गरीबों के अधिकार पर चोट के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि रोजगार का अधिकार कानून से निकलकर अगर मिशन में बदला गया तो जवाबदेही कमजोर होगी। कांग्रेस की रणनीति पिछले लोकसभा चुनाव में संविधान बदलने के मुद्दे जैसा इसे भी भावनात्मक बनाना है।
गांधी के नाम से जुड़ी योजना को बचाने का नारा, गांव-गांव अभियान और पंचायत चुनाव के जरिए खोई हुई जमीन तलाशने की कोशिश शुरू हो गई है। इसके उलट, सरकार और भारतीय जनता पार्टी का फोकस बेहतर विकल्प के प्रचार पर है। योगी सरकार कह रही है कि नई योजना सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि दायरा बढ़ाना है। 100 की जगह 125 दिन का काम, कौशल प्रशिक्षण, आजीविका से जोड़ने की बात, यानी मजदूरी से आगे बढ़कर रोजगार का मॉडल। गांवों में विशेष ग्राम सभाएं, चौपालें और प्रशासनिक सक्रियता यह बताती है कि सरकार इसे चुनावी मुद्दे के तौर पर हल्के में नहीं ले रही।
असल में यह बहस नाम बनाम भरोसे की है। मनरेगा एक जाना-पहचाना नाम है, जिस पर ग्रामीणों का विश्वास बना हुआ है। वहीं जी-राम-जी सरकार के लिए विकास का नया नैरेटिव गढ़ने का जरिया है। भाजपा को भरोसा है कि अगर काम के दिन बढ़े और भुगतान समय पर हुआ, तो गांव का मतदाता बदलाव को स्वीकार कर लेगा। पंचायत चुनाव की प्रकृति ही ऐसी है कि यहां बड़े भाषणों से ज्यादा असर रोजमर्रा के अनुभव का होता है। जिसने काम पाया, मजदूरी मिली, वही गांव में चर्चा तय करता है। इसलिए यह लड़ाई पोस्टर और बयानों से ज्यादा जमीन पर परिणामों की है। अगर नई योजना शुरुआती दौर में ही भ्रम या देरी का शिकार हुई तो विपक्ष को धार मिलेगी। लेकिन अगर लाभ साफ दिखा, तो विरोध की हवा निकल सकती है।
तय करेगा 2027 की सियासत की दिशा
पंचायत चुनाव से पहले यह जंग और तेज होगी। नतीजे तय करेंगे कि यूपी के गांव विकास के नए वादे के साथ खड़े होते हैं या परिचित अधिकार के पक्ष में। यही संकेत 2027 की सियासत की दिशा भी तय करेगा। पंचायत चुनाव में 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता 8 लाख से अधिक पदों पर वोट देते हैं। 2021 के चुनावों में भाजपा ने यह साबित कर दिया कि वह बिना आधिकारिक पार्टी सिंबल के भी अपने समर्थित उम्मीदवारों को जितवा सकती है। महामारी के बावजूद संगठनात्मक ताकत और सरकारी योजनाओं की पहुंच ने बढ़त दिलाई। जिला पंचायत की 75 में से 67 सीटों पर भाजपा का कब्जा रहा, समाजवादी पार्टी को पांच और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली।
कांग्रेस की रणनीति
• मनरेगा का अर्थ अधिकार आधारित कानून
• नाम और ढांचे में बदलाव से गरीबों के हक पर हमला
• 5 जनवरी से ‘मनरेगा बचाओ अभियान’
• पंचायत चुनाव को संगठन पुनर्निर्माण का मौका
भाजपा की रणनीति
• ‘जी राम जी’ योजना का आक्रामक प्रचार
• रोजगार के दिन 125 करने का दावा
• ग्रामसभाओं और चौपालों के जरिए संवाद
• योजनाओं को चुनावी नैरेटिव में बदलने की कोशिश
यह भी पढ़ें : राष्ट्रपति मुर्मू ने लॉन्च किया ‘स्किल द नेशन’ चैलेंज : एआई को बताया युवा भारत के लिए बड़ा अवसर
