संपादकीय : जायज चिंता 

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Published By Monis Khan
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भारतीय वायुसेना प्रमुख द्वारा लड़ाकू विमानों की कमी को लेकर दोबारा जताई गई चिंता, एक ठोस रणनीतिक यथार्थ का प्रतिबिंब है। आज भारतीय वायुसेना के पास मात्र 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन में 600 विमान बचे हैं, जबकि अधिकृत आवश्यकता कम से कम 42 स्क्वाड्रनों की है। यह अंतर भारत के पाकिस्तान और चीन के साथ संभावित दो-मोर्चों के संघर्ष की आशंका के मद्देनजर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर रणनीतिक प्रश्न है।

यह स्थिति और जटिल होगी, क्योंकि आने वाले वर्षों में तमाम पुराने विमानों की विदाई तय है। मिग-21 अपनी सेवा अवधि पूरी कर चुका है और जगुआर के चार स्क्वाड्रन 2027 के बाद चरणबद्ध रूप से रिटायर होने लगेंगे, ऊपर से इनकी दुर्घटनाएं भी आए दिन बढ़ रही हैं। इससे स्क्वाड्रन संख्या और घटेगी। पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी स्टील्थ फाइटर के लिए एएमसीए कार्यक्रम शुरू हो चुका है, लेकिन पहला विमान 2035 से पहले मिलने की उम्मीद नहीं है। यानी अगले एक दशक तक एक स्पष्ट ‘क्षमता अंतराल’ बना रहेगा। इस गैप को भरने के लिए वायुसेना के सामने तीन व्यावहारिक रास्ते हैं—स्वदेशी उत्पादन को तेज़ करना, सीमित अवधि के लिए विदेशी खरीद और बल संरचना में स्मार्ट टेक्नोलॉजी का समावेश।

1996 में 41 स्क्वाड्रन से आज 29 तक की गिरावट इस बात की याद दिलाती है कि सुस्त और जटिल खरीद प्रक्रियाएं कितनी महंगी पड़ सकती हैं। जरूरी है लड़ाकू विमानों की जल्द खरीद और स्वदेशी का फाइटर जेट्स का शीघ्र समावेश। विदेशी विकल्पों के तौर पर रूस के स्टेल्थ फाइटर सुखोई-57 फेलोन, जिसमें किंजल जैसी हाइपरसोनिक मिसाइल के इंटीग्रेशन की बात कही जाती है, एक संभावित ‘रेस्क्यू पैकेज’ कहा जा रहा है, तो अमेरिका का एफ-35 भी होड़ में है, हालांकि उससे जुड़ी लागत और रणनीतिक शर्तें कुछ ठीक नहीं हैं। इन सौदों की बात ही क्या, जब 114 रॉफेल जेट्स की प्रस्तावित खरीद लंबे समय से अटकी हुई हो।

 स्वदेशी मोर्चे पर तेजस एमके-1ए विमान संख्या की तात्कालिक कमी को आंशिक रूप से भर सकता है, पर इसका उत्पादन अत्यंत धीमा है, हालांकि एयरबोर्न सर्विलांस, प्लेटफॉर्म, डीआरडीओ के नेत्रा सिस्टम और ड्रोन वारफेयर— स्वार्म, लोटरिंग और सर्विलांस ड्रोन इत्यादि में निवेश बढ़ रहा है। उत्तरी सीमाओं, द्वीप क्षेत्रों और रणनीतिक ठिकानों को डबल कवर देने के लिए एकीकृत एयर डिफेंस नेटवर्क पर काम जारी है, लेकिन अभी काफी दूरी तय करनी बाकी है। 

वायुरक्षा प्रणाली एस-400, आकाश और आकाशतीर जैसे नेटवर्क देश की वायु-सीमा को मजबूत बनाते हैं, लेकिन वे फाइटर जेट्स का विकल्प तो कतई नहीं बन सकते हैं। एयर डिफेंस बचाव कर सकता है, पर युद्ध जीत नहीं सकता। सवाल यह है कि वायुसेना प्रमुख की चिंता कब तक दूर होगी? जवाब है, आधुनिक, तेज़, स्टील्थ-सक्षम और मल्टी-रोल फाइटर जेट्स का ऐसा संतुलित बेड़ा जो रक्षा के साथ आक्रामक बढ़त भी दे, उसकी मौजूदगी तभी संभव होगी जब राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दे कर तात्कालिक खरीद, मध्यम अवधि की स्वदेशी क्षमता और दीर्घकालिक दृष्टि, सब पर समान गंभीरता से अविलंब बढ़ा जाए।