तुर्कमान गेट पर फिर गरजे बुलडोजर: ताजा हुईं 1976 की इमरजेंसी की यादें, पलक झपकते ही हजारों लोग हो गए थे बेघर

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Published By Muskan Dixit
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नई दिल्ली। देश में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की समस्या आज की नहीं बल्की का काफी पुरानी है, लेकिन राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक तुर्कमान गेट एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। यहां फैज-ए-इलाही मस्जिद के आसपास कथित अवैध निर्माणों को हटाने के लिए 7 जनवरी 2026 को तड़के एमसीडी की टीम ने बुलडोजर चलाया, जिसके बाद इलाके में तनाव फैल गया। स्थानीय लोगों के विरोध और पथराव के चलते पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े, जबकि पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए।

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यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के आदेश पर आधारित थी, जिसमें रामलीला मैदान के पास करीब 38,940 वर्ग फुट अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे। एमसीडी ने दिसंबर 2025 में नोटिस जारी कर स्पष्ट किया था कि मस्जिद के मूल 0.195 एकड़ हिस्से को छोड़कर बाकी ढांचे अवैध हैं, क्योंकि कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं किए गए। कार्रवाई में बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर और दुकानों को ध्वस्त किया गया। मस्जिद की जमीन पूरी तरह से खुद सुरक्षित है।

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तुर्कमान गेट का ऐतिहासिक महत्व

तुर्कमान गेट मुगल काल की शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) की प्राचीन दीवार का एक प्रमुख प्रवेश द्वार है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी में शाहजहां के समय हुआ था। इसका नाम सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर पड़ा, जिनकी दरगाह पास ही है। यहां हर साल उर्स मनाया जाता है। यह आयताकार ढांचा तीन मेहराबों और दो मंजिला बुर्जों वाला मुगल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है।

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1976 की दर्दनाक यादें

लगभग 50 साल पहले, 1976 में इमरजेंसी के दौरान तुर्कमान गेट पहली बार बड़े विवाद में आया था। संजय गांधी के निर्देश पर झुग्गी हटाओ और नसबंदी अभियान के तहत यहां बुलडोजर चलाए गए। 13 अप्रैल से शुरू हुई कार्रवाई 19 अप्रैल को हिंसक हो गई, जब पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए। शाह कमीशन के अनुसार आधिकारिक मौतें छह थीं, लेकिन स्वतंत्र रिपोर्ट्स में संख्या ज्यादा बताई जाती है। यह दिल्ली के इतिहास का काला अध्याय बना।

आज की घटना से उन पुरानी यादें ताजा हो गईं। मस्जिद प्रबंधन समिति ने एमसीडी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जहां कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात है और स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। यह मामला एक बार फिर अतिक्रमण, इतिहास और सामुदायिक संवेदनशीलता के मुद्दे को उजागर कर रहा है।

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