Raisina Dialogue: IRIS LAWAN को कोच्चि में रुकने की अनुमति देना मानवीय फैसला, जयशंकर बोले, इसमें कुछ गलत नहीं
दिल्ली। विदेश मंत्री डा. एस. जयशंकर ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस लावन को कोच्चि बंदरगाह पर रूकने की अनुमति देने के भारत के फैसले पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए कहा है कि यह विशुद्ध कानूनी जटिलताओं से परे मानवीय आधार पर लिया गया निर्णय है जो उनकी समझ से सही है।
डा. जयशंकर ने शनिवार को यहां प्रतिष्ठित रायसीना डायलाॅग के तीसरे और अंतिम दिन 'हिन्द महासागर का भविष्य' विषय पर पैनल चर्चा में हिस्सा लेते हुए सवालों के जवाब में कहा कि ईरानी युद्धपोत को कोच्चि बंदरगाह पर रुकने का निर्णय विशेष परिस्थितियों और मानवीय आधार पर लिया गया है और इसे कानूनी बारीकियों में नहीं तोला जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ईरान के तीन युद्धपोत आईआरआईएस डेना, आईआरआईएस लावन और आईआरआईएस बुशहर पिछले महीने विशाखापत्तनम में नौसेना के अंतर्राष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा समारोह तथा मिलन अभ्यास में शामिल होने आये थे और बाद में हिन्द महासागर में थे। भारत की ओर से यह बयान ईरान के एक युद्धपोत आईआरआईएस डेना पर अमेरिकी नौसेना के हमले के दो दिन बाद आया है।
विदेश मंत्री ने कहा ,"जहां तक जहाज़ के अंदर आने की इच्छा का सवाल है, वे कठिनाइयों में थे। मुझे लगता है कि मानवीय दृष्टिकोण से उनकी मदद करना सही था। हमने इस मामले को सरल रुप में और मानवता के नज़रिए से देखा न कि केवल कानूनी मुद्दों के दृष्टिकोण से।" उन्होंने कहा कि भारत की तरह श्रीलंका ने भी ईरान के युद्धपोत को डॉक करने की अनुमति दी है।
इस घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए उन्होंने कहा," उस समय यह जहाज़ बंदरगाह के सबसे नज़दीकी जलक्षेत्र में आना चाहता था। रिपोर्टें थीं कि उन्हें समस्याएं हो रही थीं। मेरी जानकारी के अनुसार यह 28 तारीख को हुआ था, और एक मार्च को हमने कहा कि ठीक है, आप आ सकते हैं। फिर उन्हें आने में कुछ दिन लगे।"
उन्होंने कहा कि जब ये युद्धपोत यहां आये थे तो स्थिति पूरी तरह अलग थी लेकिन चीज़ें तेज़ी से और स्वतंत्र रूप से विकसित हो रही थीं और वे इन घटनाओं के गलत दौर में यहां फंस गये। यह पूछे जाने पर कि भारत हिन्द महासागर में प्रमुख सुरक्षा प्रदाता देश है और ऐसे में यदि किसी युद्धपोत पर हिन्द महासागर में हमला किया जाता है तो इसे किस तरह से देखा जाना चाहिए इस पर विदेश मंत्री ने कहा ,"अब सवाल यह है कि इससे क्षेत्र में एक "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" के रूप में भारत की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है। मुझे लगता है कि इस समय सोशल मीडिया पर इस विषय पर बहुत बहस चल रही है।
सोशल मीडिया अपनी प्रकृति से ऐसा मंच है जहां बहुत तीखे, झुकाव वाले और कभी-कभी चरम विचार व्यक्त किए जाते हैं।" डा. जयशंकर ने कहा कि हिन्द महासागर केवल हिन्द महासागर से लगे देशों तक ही सीमित है ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा," हिन्द महासागर की वास्तविकता को समझें। डिएगो गार्सिया पिछले पांच दशकों से हिन्द महासागर में मौजूद है।
जिबूती में विदेशी सैन्य बलों की तैनाती इस सदी के पहले दशक की शुरुआत में हुई थी। इसी अवधि के दौरान हम्बनटोटा भी बना।" उन्होंने कहा कि इस सदी के पहले दशक से ही हिन्द महासागर में विदेशी बलों की मौजूदगी रही है। इसलिए यह मानना कि हिन्द महासागर केवल उन्हीं देशों तक सीमित है जो उससे लगे हुए हैं, सही नहीं है।
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