सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के पारिस्थितिकी प्रभाव पर जताई चिंता, लद्दाख के जंगली कुत्तों पर मांगी रिपोर्ट
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों से खतरे के मामलों पर गुरुवार को अपनी स्वतः संज्ञान सुनवाई जारी रखते हुए लद्दाख में दुर्लभ वन्यजीवों पर जंगली कुत्तों के प्रभाव को उजागर करने के बाद विचार-विमर्श के दायरे में पारिस्थितिकी चिंताओं को शामिल किया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारी की पीठ ने पशु कल्याण संगठनों, कुत्ते के हमलों से पीड़ितों, नगर निकायों और अन्य हितधारकों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं से सार्वजनिक सुरक्षा, पूर्व निर्देशों का अनुपालन एवं पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के कार्यान्वयन से संबंधित मुद्दों पर विस्तृत दलीलें सुनीं।
उच्चतम न्यायालय ने अधिवक्तओं को 29 दिसंबर की एक समाचार रिपोर्ट का अध्ययन करने का निर्देश दिया, जिसमें लद्दाख में जंगली कुत्तों द्वारा दुर्लभ प्रजातियों का शिकार करने की घटनाओं को उजागर किया गया था। पीठ ने संकेत दिया कि पर्यावरण एवं वन्यजीव संबंधी विचार भी न्यायालय के भविष्य में दिए जाने वाले निर्देशों में सहायक होंगे। मामले की अगली सुनवाई नौ जनवरी को होगी। एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि बुधवार को सुनवाई के दौरान चिह्नित किए गए शेष चार राज्यों ने रात भर में अपना हलफनामा दाखिल कर दिया है।
इसके साथ ही अब तक 16 राज्यों ने अनुपालन हलफनामे दाखिल कर दिया है जबकि सात राज्यों को ऐसा करना बाकी है। उन्होंने अनुपालन का समेकित तालिकीय चार्ट रिकार्ड पर रखने के लिए एक अतिरिक्त दिन का अनुरोध किया। अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने कहा कि चार प्रमुख राज्यों ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की है।
उन्होंने कुत्तों को अचानक हटाने के खिलाफ चेतावनी देते हुए तर्क दिया कि इससे पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ सकता है क्योंकि इससे चूहों की आबादी बढ़ सकती है। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि बिल्लियों को प्रोत्साहित करने से चूहों को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायालय ने कभी भी सभी कुत्तों को हटाने का निर्देश नहीं दिया है और कोई भी कार्रवाई एबीसी नियमों के अनुरूप ही होनी चाहिए।
अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने इस बात पर बल दिया कि नसबंदी के बाद उसी क्षेत्र में कुत्तों को पुनः छोड़ना ही एकमात्र सिद्ध सफल मॉडल है। उन्होंने चेतावनी दी कि भीड़भाड़ वाली सुविधाओं में बड़े पैमाने पर आश्रय देने से बीमारियों का प्रसार बढ़ सकता है और तर्क दिया कि राज्यों द्वारा बार-बार नियमों के उल्लंघन को एबीसी नियमों को कमजोर या खारिज करने का आधार नहीं मानना चाहिए। पशु अधिकार विशेषज्ञ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने अनुमान लगाया कि प्रस्तावित दृष्टिकोण पर लगभग 26,800 करोड़ रुपये का व्यय होगा जिसके लिए पूरे देश में 91,000 से अधिक आश्रय स्थलों के निर्माण की आवश्यकता होगी।
उन्होंने नियमों को लागू करने के लिए समर्पित बजटीय आवंटन के अभाव की ओर इशारा किया और एक एकल नोडल एजेंसी के निर्माण, जिला स्तरीय अवसंरचना, प्रशिक्षित जनशक्ति और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) निधियों के उपयोग का सुझाव दिया। उन्होंने एडब्ल्यूबीआई के एसओपी की भी आलोचना की, जिसमें कथित रूप से सुरक्षा मानकों को कमजोर करना शामिल है, जैसे बाड़ की ऊंचाई कम करना और अप्रशिक्षित कर्मियों को कुत्तों को पकड़ने की अनुमति देना आदि।
वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि कुत्तों की राष्ट्रव्यापी गणना का अभाव संरचनात्मक खामी है और कि कुत्तों की अंतिम गणना 2009 में हुई थी। उन्होंने कहा कि आश्रय क्षमता का आकलन किए बिना कुत्तों को पकड़ना एबीसी नियमों का उल्लंघन है और इससे संक्रमित जानवरों के स्वस्थ जानवरों के साथ मिलने का खतरा है।
उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया कि जब तक विश्वसनीय डेटा एवं पर्याप्त अवसंरचना तैयार नहीं हो जाता तब तक वह अपने पूर्व निर्देशों को स्थगित रखे। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि कुत्तों को हटाने से पहले जनगणना एवं चिन्हित करने की आवश्यकता है और इसे राज्यों द्वारा पूर्ण गैर-अनुपालन के रूप में वर्णित किया। उन्होंने पशु प्रेमियों एवं एनजीओ को सुनवाई से पहले पैसे जमा करने की आवश्यकता वाले पिछले निर्देश पर भी चिंता व्यक्त की और तर्क दिया कि इससे न्याय तक पहुंच में बाधा उत्पन्न होती है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि बिना ऐसे उपाय के, अदालत को सभी हस्तक्षेपकर्ताओं को समायोजित करने के लिए एक पंडाल की आवश्यकता होगी। विनय नवारे और नकुल दीवान सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दोहराया कि एबीसी नियमों को चुनौती नहीं दी गई है और वैधानिक संरचना के अंतर्गत पुनः रिहाई ही सामान्य प्रक्रिया बनी हुई है।
उन्होंने लखनऊ और आईआईटी दिल्ली में लागू किए गए सफल मॉडलों को व्यापक स्तर पर अपनाने, स्थानीय निकायों की भूमिका को मजबूत करने और माइक्रोचिपिंग जैसे तकनीकी समाधानों को अपनाने का सुझाव दिया। पीड़ितों एवं नागरिक समूहों की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने बार-बार होने कुत्ते के काटने की घटनाओं का जिक्र किया और तर्क दिया कि आक्रामक कुत्तों को दोबारा स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए और आवासीय परिसरों को संस्थागत परिसरों जैसी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत घरों और सड़कों तक सार्वजनिक पहुंच को चारागाह क्षेत्रों के निर्माण द्वारा कम नहीं किया जा सकता है। पशु कल्याण के पक्ष में, वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और सिद्धार्थ लूथरा ने विशेषज्ञ समिति के गठन पर बल दिया और वैधानिक व्यवस्था से परे न्यायिक निर्देशों के प्रति आगाह किया।
उन्होंने चेतावनी दी कि कुत्तों को लंबे समय तक नजरबंद रखना क्रूरता के समान है और इस बात पर बल दिया कि मौजूदा वैधानिक निकायों को अपना कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय और आईआईटी दिल्ली जैसे संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों ने ऐसे आंकड़े पेश किए जिनसे पता चलता है कि निरंतर नसबंदी, टीकाकरण एवं निगरानी कार्यक्रमों ने कुत्तों को स्थानांतरित किए बिना आक्रामकता और रेबीज को बहुत हद तक कम कर दिया है।
उन्होंने यह तर्क दिया कि स्थानीय प्रशासन द्वारा समर्थित संस्थाओं की पहलें, दीर्घकालिक अवसंरचना के विकास के दौरान तत्काल राहत प्रदान कर सकती हैं। सुनवाई समाप्त करते हुए, पीठ ने मामले की जटिलता एवं गंभीरता को स्वीकार किया तथा मानव सुरक्षा, पशु कल्याण एवं पारिस्थितिक पहलुओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। इस मामले की आगे की सुनवाई शुक्रवार नौ जनवरी को होगी।
