जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए कार्बन उत्सर्जन पर लगाम जरूरी
वैश्विक जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की एक ज्वलन्त समस्या है। जलवायु में हो रहे तेजी से परिवर्तन पूरे विश्व में चर्चा का विषय बने हुए हैं। विश्व के भू-विज्ञानी एवं भूगोलवेत्ता जलवायु में हो रहे इन परिवर्तनों से बहुत चिन्तित हैं। असमय बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि, अनावष्टि, ओलावृष्टि, तेजाबी वर्षा तथा ऋतुओं के बदलते चक्र से पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। भू-विज्ञानी इन सबको वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं।-सुरेश बाबू मिश्रा
वैश्विक जलवायु परिवर्तन का एक बहुत बड़ा कारण है कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में हो रही लगातार भारी वृद्धि। वायुमंडल में सभी गैसें एक निश्चित अनुपात में विद्यमान हैं। परंतु अंधाधुंध परमाणु परीक्षणों, बढ़ता औद्योगीकरण तथा वाहनों की लगातार बढ़ रही संख्या के कारण वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा में भारी वृद्धि हो रही है। पिछले 100 वर्षों में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा में 26 लाख टन की वृद्धि हुई है, जबकि आक्सीजन की मात्रा में 24 लाख टन की कमी आई है। यह स्थिति सम्पूर्ण मानवता के लिए बहुत चिंताजनक है।
कार्बन उत्सर्जन में चीन सबसे आगे
कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन सबसे आगे है। विश्व के कुल कार्बन उत्सर्जन का 24 प्रतिशत उत्सर्जन अकेले चीन करता है। चीन के बाद दूसरा स्थान अमेरिका का है। अमेरिका विश्व के कुल कार्बन उत्सर्जन का 15.1 प्रतिशत उत्सर्जन करता है। यूरोपीय संघ विश्व के कार्बन उत्सर्जन का 10.5 प्रतिशत उत्सर्जन करता है। भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है। कार्बन उत्सर्जन में उसका विश्व में चौथा स्थान है। भारत कुल कार्बन उत्सर्जन का 6.4 प्रतिशत उत्सर्जन करता है। अगर दुनिया के देशों ने कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं किया तो निकट भविष्य मंे जलवायु परिवर्तन की समस्या भयावह रूप धारण कर लेगी।
ओजोन परत का क्षरण
वाहनों, हवाई जहाजों, कल-कारखानों से निकलने वाले धुएं तथा विद्युत सयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन से ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसके परिणामस्वरुप धरती का तापमान बढ़ रहा है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन का खतरा दिनों-दिन गहरा होता जा रहा है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है ओजोन परत के आकार का निरंतर कम होना। ओजोन परत वायुमंडल की एक महत्वपूर्ण परत है। यह परत पृथ्वी के सुरक्षा कवच का काम करती है। इसे धरती की छतरी भी कहा जाता है। ओजोन परत में ओजोन गैस की प्रधानता होती है। यह 32 किमी से 80 किमी की ऊंचाई तक फैली हुई है। यह परत पराबैंगनी किरणों की ऊष्मा को सोख लेती है और पराबैंगनी किरणों की ऊष्मा से मानव की रक्षा करती है। यदि ओजोन परत नहीं होती तो पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह प्राणिविहीन और वीरान होती। परन्तु मानव की अपनी नादानी के कारण ओजोन परत का आकार निरंतर घट रही है।
विश्व मौसम संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अंटार्टिका महाद्वीप के ऊपर ओजोन परत में छेद है। इस छेद का आकार इतना बढ़ गया है कि पृथ्वी का एक करोड़ किलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया है। यह स्थिति बहुत ही चिन्ताजनक है। सन् 1995 में ओजोन परत को नष्ट करने वाले रसायनों का प्रयोग कम करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता हुआ था, परंतु निहित स्वार्थों और परमाणु हथियारों की होड़ के कारण दुनिया के देश इस समझौते का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे ओजोन परत का आकार निरंतर घट रहा है। इसके परिणामस्वरुप हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम झेलने को मजबूर हैं। पृथ्वी के बढ़ते तापमान का एक प्रमुख कारण पृथ्वी पर घटती हरियाली भी है। कहते है कि खुशहाली का रास्ता हरियाली से होकर गुजरता है। वृक्ष पर्यावरण के सजग प्रहरी होते हैं। वे पर्यावरण के सन्तुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परन्तु मानव की धन की बढ़ती हवस के कारण वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई हो रही है जो गम्भीर चिन्ता का विषय है। जिस प्रकार शरीर के अस्तित्व के लिए कम से कम एक तिहाई त्वचा का सुरक्षित होना जरूरी है ठीक उसी प्रकार पृथ्वी के अस्तित्व के लिए उसके कम से कम एक तिहाई भाग पर हरियाली होना आवश्यक है। परन्तु वर्तमान समय में धरती के केवल 22 प्रतिशत भू-भाग पर वृक्ष हैं, जिसके परिणामस्वरुप पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है और वैश्विक जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या हमारे सामने मुंह बाए खड़ी है। इस प्रकार हम पाते हैं कि कार्बन का अधिक उत्सर्जन और धरती का बढ़ता तापमान वैश्विक जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। पिछले दस वर्षों में पृथ्वी के औसत तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हुई है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आने वाले वर्षों में धरती के तापमान में और वृद्धि होगी। जिसके कारण ग्लेशियरों और ध्रुवों पर जमीं बर्फ पिघलने लगेगी और समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा। पेरिस वैश्विक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में यह आशंका व्यक्त की गई कि यदि पृथ्वी का तापमान इसी प्रकार बढ़ता रहा तो समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण दुनिया के 9 देश और 705 छोटे-बड़े नगर समुद्र में समा जायेंगे। एक आंकलन के अनुसार भूमण्डल का 2.5 प्रतिशत जल बर्फ के रूप मंे विद्यमान है। यदि ग्लेशियरों और धु्रवों पर जमीं सारी बर्फ पिघल गई तो समुद्र का जल स्तर इतना बढ़ जायेगा कि पूरी पृथ्वी समुद्र के जल से जलमग्न हो जायेगी और पृथ्वी पर महाप्रलय आ जायेगी। इसलिए हम महाप्रलय की आहट को सुनें और धरती के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए कारगर कदम उठाएं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन पृथ्वी और मानवता के अस्तित्व के लिए एक गम्भीर खतरा है। इसलिए विश्व के सभी देशों को एकजुट होकर इसको नियंत्रित करने के लिए कारगर उपाय करने चाहिए।
