संपादकीय : श्वान संकट का समाधान

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Published By Monis Khan
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श्वान और इंसान का संबंध हजारों वर्षों पुराना है। सुरक्षा, सहचर्य, प्रेम और वफादारी का यह रिश्ता आज एक विद्रूप सामाजिक संकट बनकर अदालत के कठघरे तक पहुंच गया है। सवाल यह है कि इस स्थिति का दोषी कौन है- आम आदमी, व्यवस्था या कुत्ता? तो जवाब होगा कि वह सभी जिसने इस संकट को यहां तक आने दिया। कुत्ता स्वभाव से आक्रामक नहीं होता; उसे ऐसा बनाता है अव्यवस्थित शहरीकरण, लापरवाह पालतू-पालन, कमजोर नगर प्रशासन और नीति-क्रियान्वयन की लगातार विफलता। 

सुप्रीम कोर्ट की चिंता पूरी तरह जायज है। पालक के नियंत्रण से बाहर कुत्ते केवल रेबीज का खतरा ही नहीं बढ़ा रहे, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं, बच्चों-बुजुर्गों पर हमलों, स्थायी अपंगता और मौत का कारण भी बन रहे हैंस लेकिन करोड़ों आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान न तो क्रूर हो सकता है, न ही भावुक, इसके लिए वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक नीति चाहिए। उत्तर प्रदेश ने आवारा कुत्तों को माइक्रोचिप लगाने, दोबारा काटने पर आजीवन शेल्टर में भेजने जैसे कई नियम बनाए, लेकिन डॉग-बाइट और रेबीज से होने वाली मौतें अभी भी बहुत हैं। यूपी की पहल ठीक है, लेकिन अधिकांश राज्यों की गंभीरता सवालों के घेरे में है। 

नवंबर में जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब किया, तो कोई उपस्थित नहीं हुआ। हलफनामा मांगा गया- मात्र 10 राज्यों ने दिया। मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब जैसे बड़े राज्यों की चुप्पी प्रशासनिक उदासीनता को ही दर्शाती है। केंद्र और राज्यों ने पिछले दो दशकों में एनीमल बर्थ कंट्रोल और एंटी-रेबीज कार्यक्रमों के नियम तो बनाए, पर क्रियान्वयन बेहद कमजोर रहा। देशभर में महज 66 एबीसी केंद्र प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं, जबकि कुत्तों की आबादी बेकाबू है। 

2024 के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र और तमिलनाडु में पांच-पांच लाख, गुजरात और कर्नाटक में लगभग चार-चार लाख लोगों को कुत्तों ने काटा। इसके बावजूद इसके लिए बजट, प्रशिक्षित मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे का उचित प्रबंध नहीं हुआ।  संस्थानों को ‘कुत्ता-मुक्त’ रखने के लिए फेंसिंग का आदेश व्यावहारिक नहीं। रेलवे स्टेशन बहु-दिशात्मक खुले परिसर हैं, तो 16 लाख से अधिक शैक्षणिक संस्थानों में से अनेक के पास बिजली-पानी तक का बजट नहीं— वे बाड़बंदी कैसे करें? कुत्तों को शेल्टर होम में रखना भी अव्यावहारिक है। 

अनुमानित एक लाख शेल्टर होम पर लगभग 30,000 करोड़ की पूंजी, चिकित्सा-खानपान पर सालाना भारी खर्च और बीमारियों का जोखिम। सीएसवीआर मॉडल यानी पकड़ो, नसबंदी करो, वैक्सीन लगाओ और जहां से लाए वहीं छोड़ो— वैज्ञानिक रूप उचित लगता है, बशर्ते इसे बड़े पैमाने, पर्याप्त बजट, सटीक डेटा और कड़ी निगरानी के साथ लागू किया जाए। इसके साथ पालतू कुत्तों के अनिवार्य पंजीकरण, लापरवाही पर जुर्माना, उचित कचरा निस्तारण और समुदाय-स्तरीय जागरूकता अनिवार्य है। दुनिया के कई देशों— जैसे जापान, नीदरलैंड्स और सिंगापुर ने कड़े पंजीकरण, व्यापक नसबंदी, जिम्मेदार पालतू-पालन और सख्त नगर प्रबंधन से इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया है। भारत, जहां रेबीज से सबसे अधिक मौतें होती हैं, इन अनुभवों से सीख लेनी होगी।