अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समकालीन कला का संकट

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Published By Anjali Singh
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भारतीय कला इतिहास की चर्चा करते समय प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि सदियों तक यह परंपरा पुरुषसत्ता, राजसत्ता और धर्मसत्ता के प्रभाव में संचालित होती रही। वरिष्ठ कलाकार और कला समीक्षक अशोक भौमिक के अनुसार, इसी कारण भारतीय कला में लंबे समय तक आम जनजीवन, शर्म, पीड़ा और व्यक्तिगत भावनाओं का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण सीमित रहा। इस दृष्टि से देखें, तो उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के आरंभ में विकसित बंगाल पुनर्जागरण काल की कला भी इस संरचनात्मक सीमा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी।

ऐसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता के बाद प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (1947) की स्थापना भारतीय कला में एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आती है। एफ.एन. सूज़ा, एम.एफ़. हुसैन, एस.एच. रज़ा, के.एच. आरा और रामकुमार जैसे कलाकारों ने न केवल औपनिवेशिक अकादमिक यथास्थिति को चुनौती दी, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक यथार्थ और आधुनिक चेतना को चित्रकला का विषय बनाया। यह वह क्षण था, जब भारतीय कला में कलाकार की निजी अभिव्यक्ति पहली बार पूरे आत्मविश्वास के साथ उभरती है। -सुमन कुमार सिंह, कलाकार/कला लेखक

संवाद होना चाहिए कला का मूल उद्देश्य 

आधुनिकता के विस्तार को आगे बढ़ाते हुए भूपेन खख्खर ने मध्यमवर्गीय जीवन, यौनिक पहचान और घरेलू संसार को चित्रकला के केंद्र में रखा, गुलाम मोहम्मद शेख ने इतिहास, मिथक और समकालीन राजनीति के जटिल संवाद रचे और अर्पिता सिंह ने स्त्री अनुभवों को निजी स्मृति और सामाजिक असुरक्षा के साथ जोड़ा। इन कलाकारों के यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अराजक नहीं, बल्कि वैचारिक जिम्मेदारी के साथ दिखाई देती है। हालांकि पिछले दो-तीन दशकों में समकालीन भारतीय कला में एक ऐसी प्रवृत्ति भी तेजी से उभरी है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वयं एक उद्देश्य बनती दिखाई देती है।

परिणामस्वरूप ऐसी कृतियां सामने आती हैं, जिनमें न तो माध्यम के साथ गहरा संघर्ष दिखता है, न विषय के साथ कोई जोखिम। कई बार ये कृतियां वैश्विक कला बाजार की मांग, क्यूरेटर-केंद्रित शब्दावली या त्वरित दृश्य प्रभाव के लिए गढ़ी हुई प्रतीत होती हैं। इसी संदर्भ में द आर्ट न्यूजपेपर के सहयोगी संपादक बेन ल्यूक का हालिया टिप्पणी-लेख “वी आर लिविंग इन एन एज ऑफ़ बैड पेन्टिंग” यानी “हम एक ख़राब कला के दौर में रह रहे हैं” विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

ल्यूक स्पष्ट करते हैं कि उनका प्रश्न केवल ब्रिटेन या फ्रिज लंदन जैसे कला मेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज की वैश्विक चित्रकला की वैचारिक स्थिति पर एक गंभीर टिप्पणी है। भारतीय संदर्भ में भी यह प्रश्न अप्रासंगिक नहीं है। एक ओर वी.एस. गायतोंडे, जेराम पटेल या नसरीन मोहम्मदी जैसे कलाकारों की परंपरा है, जहां अमूर्तता भी गहन साधना और अनुशासन से उपजती है। दूसरी ओर आज ऐसी चित्रकला भी दिखाई देती है, जो केवल ‘अवधारणा’ के नाम पर दर्शक से किसी भी संवेदनात्मक या बौद्धिक संवाद से बचती है।

यहां आम दर्शकों के बीच प्रचलित वह व्यंग्यात्मक किस्सा याद आता है- खाली कैनवास पर गाय के घास चरने की कहानी। यह मजाक भले ही अतिरंजित हो, पर वह उस दूरी की ओर संकेत करता है, जो कई बार समकालीन कला और सामान्य दर्शक के बीच पैदा हो गई है। दर्शक यह मानने को विवश हो जाता है कि आधुनिक कला समझ से परे है, जबकि कला का मूल उद्देश्य संवाद होना चाहिए- भले ही वह सहज न हो।

भारतीय समकालीन कला के सामने चुनौती

निस्संदेह, चित्रकला एक दृश्य भाषा है और उसका अनुवाद शब्दों में अनिवार्य नहीं। किंतु इतिहास बताता है कि महान आधुनिक और समकालीन कलाकारों-चाहे वे रामकुमार, तैयब मेहता हों या के.जी. सुब्रमण्यम, ने अपने समय के प्रश्नों से टकराते हुए ऐसी दृश्य भाषाएं रचीं, जो जटिल होते हुए भी अर्थपूर्ण थीं। यहां बेन ल्यूक का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह हमें यह याद दिलाता है कि “सब कुछ स्वीकार्य है” का वातावरण कला के लिए उतना ही खतरनाक हो सकता है, जितना सेंसरशिप।

भारतीय समकालीन कला के सामने भी आज यही चुनौती है कि वह स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, प्रयोग और संवेदना तथा वैश्विक संवाद और स्थानीय अनुभव के बीच संतुलन कैसे बनाए? स्पष्ट है कि ‘खराब कला’ की यह बहस आने वाले समय में और तेज होगी और ऐसे में संभव है कि भारतीय कला जगत के लिए यह आत्मपरीक्षण का एक ज़रूरी अवसर भी बन सकती है।