मंदिरों में सुरक्षित है, सनातन परम्परा और संस्कृति: देवकी नंदन ठाकुर

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Published By Deepak Mishra
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मथुरा। वृन्दावन में ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान के 10वें पावन पाटोत्सव महोत्सव पूरे विधि-विधान एवं हर्षोल्लास से मनाया गया। भगवान के विग्रह का पंचाभिषेक कर स्वर्ण आभायुक्त पौषाक धारण करायी गयी । मधुर भजनों के मध्य भक्तों ने खूब नृत्य कर ठाकुरजी से लाड़ लड़ाया । विभिन्न स्थानों से आये भक्तों के बीच मंदिर संस्थापक देवकीनंदन ठाकुरजी महाराज ने प्रियाकान्तजु की आरती उतारी तथा आषीर्वचन कहे। 

गुरुवार को छटीकरा मार्ग स्थित ठा. श्री प्रियाकान्तजु मंदिर के दषवें पाटोत्सव पर बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित हुये। प्रातः काल में मंदिर सेवायतों ने मंत्रौच्चार के मध्य पंचामृत से अभिषेक किया। देवकीनंदन ठाकुरजी महाराज ने सभी को बधाई देते हुये कहा कि मंदिरों में सनातन परम्परा एवं संस्कृति सुरक्षित है। 

सनातनी मंदिर केवल धार्मिक पूजा का अधिकार ही नहीं देते बल्कि अपने धर्म को बचाये रखने का स्मरण भी कराते हैं । मंदिर प्रांगण में देवकीनंदन महाराज ने भक्तों को चतुर्थ दिवस की भक्तमाल कथा का श्रवण करवाते हुये उन्होने कहा कि भक्तों की भावना से ही पाषाण की मूरत में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है ।

कहा कि सनातनियों को तिलक अवश्य धारण करना चाहिए, यह हमारा श्रंगार है । तिलक व्यक्ति को निरंतर यह स्मरण कराता है कि उसका जीवन धर्म, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर रहे। तीर्थ केवल पर्यटन स्थल नहीं होते, वे साधना, संयम और संस्कार के जीवंत केंद्र होते हैं। संत नेत्रपाल महाराज ने ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान की महिमा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि प्रियाकांत जू भगवान साक्षात करुणा, प्रेम और भक्तवत्सलता के साकार स्वरूप हैं।

उनके दर्शन मात्र से हृदय के विकार शांत हो जाते हैं और मन स्वतः ही ब्रज-भाव में लीन हो जाता है। कथा में बाल व्यास देवांश ठाकुरजी ने भक्तों को सुन्दर भजन श्रवण करवाया। इस अवसर पर विष्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट सचिव विजय शर्मा, मंदिर प्रबंधक रवि रावत, गजेन्द्र सिंह, आचार्य श्यामसुन्दर शर्मा, मंदिर सेवायत दिनेष शर्मा, राहुल शर्मा, परसोती शर्मा, सतीष गर्ग, श्रीपाल जिंदल, सावित्रि मैया, विष्णु शर्मा आदि उपस्थित रहे ।

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