समुद्र की नीली रंगत का रहस्य
भारत के महान वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सी. वी. रमन) से जुड़ा एक रोचक और प्रेरक किस्सा उनकी खोजी प्रवृत्ति को बखूबी दर्शाता है। यह किस्सा उस खोज की शुरुआत है, जिसने आगे चलकर उन्हें नोबेल पुरस्कार तक पहुंचाया। 1904 में लॉर्ड रेले को फिजिक्स का नोबेल मिला था। उन्होंने बताया था कि आसमान नीला क्यों दिखता है और समुद्र का नीला रंग आसमान के प्रतिबिंब के कारण है।
सन् 1921 में सी. वी. रमन ब्रिटेन समुद्री मार्ग से जा रहे थे। जहाज जब गहरे समुद्र में आगे बढ़ रहा था, तो उन्होंने देखा कि समुद्र का पानी गहरा नीला दिखाई दे रहा है. लेकिन रमन को रेले का तर्क संतोषजनक नहीं लगा। उनका वैज्ञानिक मन इस साधारण से दृश्य में भी प्रश्न खोजने लगा कि यदि समुद्र का रंग केवल आकाश का प्रतिबिंब है, तो बादलों के दिनों में भी वह नीला क्यों दिखता है?
यही सवाल उनके मन में बस गया। भारत लौटने के बाद उन्होंने साधारण उपकरणों से प्रकाश और तरल पदार्थों पर प्रयोग शुरू किए। उनके पास अत्याधुनिक प्रयोगशाला नहीं थी, फिर भी उन्होंने कांच की बोतलों, सूरज की रोशनी और साधारण स्पेक्ट्रोस्कोप की मदद से गहन अध्ययन किया। इन प्रयोगों से उन्होंने सिद्ध किया कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुजरता है, तो उसका कुछ हिस्सा विखरित होकर अपना तरंगदैर्घ्य बदल लेता है।
यही खोज आगे चलकर ‘रमन प्रभाव’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रभाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि समुद्र का नीला रंग आकाश का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि प्रकाश के प्रकीर्णन का परिणाम है। इस खोज के लिए सी. वी. रमन को 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। यह किसी भारतीय वैज्ञानिक को मिला पहला नोबेल पुरस्कार था। यह किस्सा हमें सिखाता है कि वैज्ञानिक दृष्टि केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं होती। एक जिज्ञासु नजर और सवाल पूछने की आदत भी महान खोजों की नींव रखती है।
