बोध कथा: विवेक और उदारता की जीत... जब एक बहू के शब्दों ने धन के अहंकार को झकझोरा
विनीता संस्कारों की छाया में पली-बढ़ी एक सुलझी हुई बेटी थी। उसका स्वभाव उतना ही विनम्र था जितना उसका नाम। बड़ों का आदर, सेवा-भाव और अनुशासित जीवन उसकी दिनचर्या का हिस्सा थे। पढ़ाई के साथ-साथ वह दूसरों के काम आने को भी अपना कर्तव्य मानती थी। इसी सहजता और सरलता के कारण वह जहां जाती, लोगों के मन में जगह बना लेती। भाग्य ने उसे ऐसे परिवार की बहू बना दिया, जहां धन तो बहुत था, पर दान और करुणा का अभाव था। उस घर में संपत्ति को केवल भोगने और बढ़ाने की सोच थी, बांटने की नहीं। धर्म और पुण्य की बातें वहां केवल शब्द बनकर रह गई थीं। एक दिन घर के द्वार पर एक वृद्ध आया, कमज़ोर, भूखा और बेसहारा। विनीता ने उसे देखा और जो घर में उपलब्ध था, वही उसे दे दिया, सूखी, बासी रोटी। वृद्ध ने उसे हाथ में लेकर कहा- “बेटी, यह मुझसे नहीं खाई जाएगी।” विनीता ने बिना किसी कटुता के उत्तर दिया- “बाबा, इस घर में ऐसा ही भोजन होता है।”
वहीं खड़े उसके श्वसुर यह सुनकर चौंक पड़े। वे बहू के व्यवहार से सदा प्रसन्न रहते थे। उन्होंने पूछा- “बेटी, तुम ऐसा क्यों कह रही हो?” विनीता ने शांत स्वर में कहा- “पिताजी, मैंने इस घर में यही देखा है कि जो धन पूर्व पुण्य से मिला है, उसे केवल संजोया और भोगा जाता है। दान, सेवा और धर्म का आचरण यहां दिखाई नहीं देता।” उसके शब्दों ने श्वसुर के मन को झकझोर दिया। उन्हें पहली बार अपनी भूल स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उसी क्षण उन्होंने बहू को उचित कार्य करने की अनुमति दी। विनीता ने तुरंत उस वृद्ध को सम्मानपूर्वक अच्छा भोजन कराया, उससे स्नेह से बातें कीं और उसके जीवन के बारे में जाना। उसे सच्चरित्र पाकर घर के पास ही रहने की व्यवस्था कर दी।
कुछ समय बाद वृद्ध बीमार पड़ा। अल्प समय में ही, ईश्वर का स्मरण करते हुए, आत्मा की शुद्धता का चिंतन करते हुए, सबके प्रति क्षमाभाव रखकर वह शांतिपूर्वक इस संसार से विदा हो गया। उसका जीवन एक मौन संदेश छोड़ गया- धन की कमी मनुष्य को केवल परेशान करती है, पर धन की अधिकता यदि विवेक से रहित हो जाए, तो वही धन मनुष्य को अहंकार, विलास और निर्दयता की ओर ले जाकर उसके पतन का कारण बन जाता है।
